ज्ञानचंद मर्मज्ञ

मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
Bangalore, Karnataka, India
मैंने अपने को हमेशा देश और समाज के दर्द से जुड़ा पाया. व्यवस्था के इस बाज़ार में मजबूरियों का मोल-भाव करते कई बार उन चेहरों को देखा, जिन्हें पहचान कर मेरा विश्वास तिल-तिल कर मरता रहा. जो मैं ने अपने आसपास देखा वही दूर तक फैला दिखा. शोषण, अत्याचार, अव्यवस्था, सामजिक व नैतिक मूल्यों का पतन, धोखा और हवस.... इन्हीं संवेदनाओं ने मेरे 'कवि' को जन्म दिया और फिर प्रस्फुटित हुईं वो कवितायें,जिन्हें मैं मुक्त कंठ से जी भर गा सकता था....... !
!! श्री गणेशाय नमः !!

" शब्द साधक मंच " पर आपका स्वागत है
मेरी प्रथम काव्य कृति : मिट्टी की पलकें

रौशनी की कलम से अँधेरा न लिख
रात को रात लिख यूँ सवेरा न लिख
पढ़ चुके नफरतों के कई फलसफे
इन किताबों में अब तेरा मेरा न लिख

- ज्ञान चंद मर्मज्ञ

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शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

                         जो किसानों की बर्बादियों पर ,
                         सौ  सौ  आँसू  बहाते  मिलेंगे !
                         वो ही बेबस गरीबों के हक़ पर,
                         अपने  सपने  सजाते मिलेंगे !

                                                    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ 

गुरुवार, 5 मार्च 2015

                                    तुम  रहो  ना  रहो  इस  जहाँ में,
                                    सिलसिले  यूँ  ही  चलते  रहेंगे !
                                    ना ही बदलेगा घर ना ये आँगन,
                                    रहने    वाले    बदलते    रहेंगे !!
                                                                 -ज्ञानचंद मर्मज्ञ 

गुरुवार, 23 अक्टूबर 2014

इस नयन से उस नयन तक,
इस धरा  से  उस गगन तक,
भोर  की  उजली किरण तक,
दीप  तुम  जलते  ही  रहना !

दीपावली की अनन्त शुभकामनायें !
                            -ज्ञानचंद मर्मज्ञ 

सोमवार, 15 सितंबर 2014

                                        हिंदी-दिवस की शुभकामनायें 


                                     जिसकी  आँखों  में  लाचार  सपने,
                                     जिसकी  वाणी में अमृत-कलश है,
                                     उसको  देखा  तो  फिर याद आया,
                                     देश   में   आज   हिंदी-दिवस   है !
                                                                     -ज्ञानचंद मर्मज्ञ 

बुधवार, 3 सितंबर 2014

                               जाने    कैसा   कमाल  करता  है ,
                               एक  पल  में  निहाल  करता   है !
                               रंग    माटी   का  चाहे  जैसा   हो ,
                               फिर भी फूलों को लाल करता है !!
                                                            -ज्ञानचंद मर्मज्ञ 

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

"मुझे रावण मत कहो"




मुझे रावण मत कहो


हमारी संस्कृति अनेक अलौकिक गाथाओं और परम्पराओ से भरी पड़ी है ! जिसे निष्ठां ,विश्वास और समर्पण की त्रिवेणी सदियों से सींचती आ रही है! इन परम्पराओं ने सदा मानवता के संरक्षण और सत्य के निरूपण में अपनी महती भूमिका निभाई है ! ये परम्पराएँ भारतीय जीवन की अमूल्य धरोहर हैं ! एक तरफ जहाँ ये हमारे जीवन में सजग चेतना को निरुपित करती हैं वहीँ दूसरी तरफ भारतीयता को समृद्ध करते हुए हमारे चरित्र को निखारकर जीवन में उच्च आदर्श स्थापित करने की प्रेरणा भी देती हैं ! 

त्रेता में भगवान् श्री राम ने ऐसी ही कई ऊँचे आदर्श और मर्यादा-पूरित परम्पराओं को स्थापित किया और अत्याचारी रावण का संहार कर इस तथ्य को निरुपित किया कि बुराई पर हमेशा अच्छाई की जीत होती है ! हर वो संकल्प जो सत्य और त्याग का अभिषेक करके किया जाता है वह निडर,पराक्रमी और अडिग होता है और अंततः विजय का अधिकारी भी होता है ! ऐसे ही सत्य-संकल्पित मनुष्य जीवन में उच्च आदर्श स्थापित कर समाज को नई दिशा प्रदान करते हैं ! भगवान् श्री राम को ज्ञात था कि कलियुग में जीने के लिए ऐसे ही उच्च आदर्शों और परम्पराओं की आवश्यकता पड़ेगी, जब मानव अपने कर्तव्यों को भूलकर असत्य के रास्ते पर चलते हुए अपनी निर्दोष,' सच्चाई की सीता' को सहज ही लालच,हवस और हैवानियत के रावन के हाथों सौंप देगा ! 

रावण जलाने की परंपरा हम वर्षों से निभाते आ रहे हैं मगर यह कभी नहीं सोचा कि क्या रावण जला भी ? और अगर जला तो कितना जला ? यह विचार करने की बात है कि अगर रावण सचमुच जल गया होता तो आज इतने रावणों की भरमार कभी नहीं होती ! आज स्थिति यह है कि जिधर देखिये बस रावण ही रावण नज़र आते हैं ! इन्हें पहचानना भी अत्यंत कठिन है क्योंकि पहले रावण के केवल दस सिर हुआ करते थे मगर आज उसके अनगिनत सिर होने लगे हैं और हर सिर के साथ चिपके होते हैं कई घिनौने चेहरे जिन पर सुन्दर-सुन्दर मुखौटे चढ़ाकर इन्हें इंसानी रूप दे दिया जाता है ! इन रावणों ने डरना भी छोड़ दिया है, क्योकि इन्हें मालुम है कि केवल राम ही इनका संहार कर सकते हैं जो अब जन्म नहीं लेते ! रही बात मनुष्यों की, तो उन्हें तो बस आँखें मूंदकर 'राम-कथा' सुनने की आदत है ! राम बनने के लिए राम के गुणों को आत्मसात करना उनके बस की बात नहीं है ! 

सोने की लंका जल जाने के बाद ये सारे के सारे रावण अब गाँव और शहर की गलियों और बस्तियों में रहने लगे हैं ! सीता-हरण के अलावा इनके और भी कई घिनौने काम होते हैं ! यही तो हैं जो आतंक फैलाकर बेकसूर लोगों को मौत के घाट उतार देते हैं और फिर मातम के सिसकते सन्नाटे में बैठकर खूब जश्न मनाते हैं ! इन्हें जिंदा लोगों के होठों पर खिले मुस्कराहट के फूलों को गिनने से ज्यादा अच्छा लगता है बम और गोलियों से चिथड़े-चिथड़े हुए लाशों के टुकड़ों को गिनना ! इनके हवस के साए से गुज़रकर, हर बलात्कार के बाद सहमी हुई ऑंखें जीवन भर के लिए किसी न किसी रावण की घिनौनी तस्वीर को अपने सपनों के साथ नंगा सोये हुए पाती हैं ! कलयुग के रावणों की सोच उम्र की मर्यादा को भी लांघ जाती है और छोटी छोटी बच्चियों की चीखें समय के वक्षस्थल को चीर कर अपनी वेवसी की कहानी लिखते हुए मृत्यु को गले लगा लेती हैं ! 

वैसे तो रावण हर युग में पैदा होते रहे हैं मगर आज के रावणों ने सभी को पीछे छोड़ दिया है ! त्रेता के रावण ने तो कभी अपने देश के साथ विश्वासघात करने को सोचा भी नहीं होगा मगर कलियुग के ये रावन अपनी माटी के साथ भी गद्दारी करने से नहीं चूकते ! देश को लूट लूट कर अपनी सोने की लंका फिर से बसाने में ये इतने मशगूल हो जाते हैं कि इन्हें यह भी याद नहीं रहता कि जिसके सम्मान का सौदा ये बीच चौराहे पर कर रहे हैं वह इनका अपना ही देश है, अपनी ही मिटटी है, अपनी ही माँ है ! सोने की चिड़िया कहे जाने वाले इस देश में अब कहीं सोने की चिड़िया तो नहीं मिलती पर उसके नोचे हुए पंख जरुर मिलते हैं जो आज भी तड़प-तड़प कर हवा में उड़ते हैं मगर कोइ न कोइ रावण उन्हें अपनी मुट्ठी में जोर से दबोच कर कहीं दूर फेंक देता है ! अगर आप सोचना चाहेंगे तो आपको निश्चय ही महसूस होगा कि बेबसी के आंसू में घोलकर ,काली स्याही से लिखी गयी हर कहानी का सूत्रधार कोइ न कोइ रावण ही है ! 

इन कलियुगी रावणों की बातें करते हुए हमने त्रेता के उस रावण के बारे में तो सोचा ही नहीं जो आज भी भगवान् शिव की आराधना में तल्लीन है ! उसने अपनी कठोर तपस्या फिर से शुरू कर दी है ! वह महादेव से पूछना चाहता है, कलयुग में उसे किस पाप की सजा दी जा रही है ! आज के दरिंदों, आतंककारियों, देशद्रोहियों, बलात्कारियों, कुकर्मियों,विषधरों को रावन की संज्ञा देकर उसके नाम को क्यों कलंकित किया जा रहा है ! हे शिव ! "मैंने तो हमेशा स्त्रियों का सम्मान किया, अकारण किसी निर्दोष को कभी नहीं मारा ! किसी दुल्हन से उसका पति और माँ से उसके कलेजे का टुकड़ा भी नहीं छीना, अपने देश को लूटकर मातृभूमि के साथ कभी गद्दारी भी नहीं की, राक्षस होकर भी ऐसा कोइ घिनौना काम मर्यादा की सीमा लांघकर कभी नहीं किया जैसा आज का मानव कर रहा है फिर इन्हें 'रावण' कहकर मुझे क्यों बदनाम किया जा रहा है ! हे महादेव ! अगर आप मुझसे सचमुच प्रसन्न हैं तो मुझे बस यह वरदान दें कि आज के बाद ऐसे घृणित लोगों के लिए प्रयुक्त होने वाले नाम 'रावण' की संज्ञा से मुझे कोई किसी भी युग में संबोधित न करे !" 


                                                                             - ज्ञानचंद 'मर्मज्ञ ' 

शनिवार, 3 मार्च 2012

                                    रंग ऐसा लगाने का वादा करो 


चढ़ सके ना कभी जिस पर नफ़रत का रंग ,रंग ऐसा लगाने का वादा करो,
भर  के  हर साँस  में  प्रेम के रंग को ,हर  गिले  भूल  जाने  का  वादा  करो !


                                                 रास्ते  जब  भी  काँटे  उगाने  लगें , पाँव  जब   भी  तेरे  डगमगाने लगें,
                                                 टूट  जाएँ  सभी  सब्र  की  डोरियाँ , हिम्मतों   के  दीये  थरथराने  लगें ,
                                                 तब समूचे समन्दर   को एक साँस में ,अंजुरी  में उठाने का वादा करो !


 कौन  सा  रंग  किस  रंग  को  है मिला ,किस चमन  में  गुलाबों  का गुलशन खिला,
किसके रंगों को नोचा गया इस कदर,किसकी आँखों को रिमझिम का सावन मिला,
 पंख   नोचे   गए    तितलियों  के  जहाँ ,  वो  चमन   फिर  बसाने  का  वादा  करो !


                                          बात  रंगों  की  है  रंग वालों  की  है, अनकहे  अनबुझे  कुछ सवालों की है !
                                          जैसी तकदीर उनके गुलालों की है,वैसी किस्मत कहाँ  अपने गालों की है !
                                          हम  हज़ारों  क़दम  दौड़  कर आयेंगे ,पाँव तुम  भी उठाने  का  वादा करो !


लाल  रंगों  में  लिपटी  हुई  होलियाँ , खेलते  खेलते  शाम  ढल जाएगी,
फिर कोई भी सवेरा ना होगा कभी, बर्फ  की  ये कहानी पिघल जाएगी !
वक्त का हर दिया हो गया है धुआं,कुछ तो जलने जलाने का वादा करो !


                                         आसमाँ  से गिराई   गयीं  बिजलियाँ, हर  गली  में  लगाईं  गयी  बोलियाँ ,
                                         रंग परछाईयों में सिमटता गया,फिर भी ठहरी थीं विश्वास की तितलियाँ !
                                         एक  उम्मीद  काफ़ी  है मुस्कान को  ,यूँ  ही  हँसने  हँसाने  का वादा  करो !


                                                                                                                                    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ 





मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011

है काफ़ी महज़ एक इंसान होना

                                                                  
आज कई दिनों के अंतराल के  बाद आप के बीच एक ग़ज़ल लेकर उपस्थित हुआ हूँ आशा है आप पूर्व की भांति अपनी सारगर्भित टिप्पणियों से अनुग्रहित कर  मेरा उत्साहवर्धन करेंगे !

                                                     ग़ज़ल



                               न हीरा, न  मोती, न  चाँदी,  न सोना 
                               है  काफ़ी  महज़   एक  इंसान   होना 

                               ये  जीवन  भी  तो एक रेखा गणित है 
                               कभी  गोल  है  तो  कभी  है  तिकोना 

                               न   महुआ  उगेगा   ना  बरगद  उगेंगे 
                               कभी  गांव  में  तुम शहर को  न बोना 

                               जो  अम्नो अमाँ   की  वफ़ा चाहते हो
                               लहू   के   निशाँ  को  लहू  से  न धोना

                               न छीनो ये चौखट ना छीनो ये आँगन
                               मकानों  को  दे  दो मकानों  का कोना 


                               उसे   सब  पता  है   वही  जानता   है 
                               किसे कब है हँसना किसे कब है रोना 

                                                                  -ज्ञानचंद मर्मज्ञ 

बुधवार, 17 अगस्त 2011

" फिर भी काँधों पे जाना पड़ेगा "

                                                                 


                                                                           


                                                                  " मौत " भाग -४

                         " फिर भी  काँधों  पे जाना पड़ेगा "


               किसने चौखट पे दस्तक लगाई ,
               किसने दरवाज़ा यूँ खटखटाया !
               सुन  के जो भी गया खोलने को ,
               लौट कर वो  कभी भी न आया !

                                     फिर  सितारों  की  बारात होगी,
                                     फिर  किसी को सजाना पड़ेगा!
                                     यूँ  तो  पैरों  में  ताक़त बहुत है,
                                     फिर भी  काँधों  पे जाना पड़ेगा!

               रो रहा आज इतिहास कल का,
               वक़्त  पर झुर्रियाँ पड़ गयी हैं !
               कल  सलीबें  उठाई  गयी  थीं,
               आज कीलें भी तो गड़ गयी हैं!

                                     हम नहीं,तुम नहीं, वो न होंगे ,
                                     वक्त  फिर  भी गुज़रता रहेगा !
                                     ज़ख्म   यूँ   ही  सँवरते  रहेंगे ,
                                     दर्द   यूँ   ही   तड़पता  रहेगा !

                                                    -अगले अंकों में जारी
                                                          -ज्ञानचंद मर्मज्ञ












गुरुवार, 7 जुलाई 2011

आते आते कफ़न छोड़ आये

                                 "मौत" भाग -३
                      'आते आते कफ़न छोड़ आये' 
 

           प्राण   के   ब्याह की रात आई,
           उम्र   के    गाँव   बारात  आई!
           गल  गयी फूल की पंखुरी तक,
           एक   ऐसी   भी  बरसात आई!

                                 फिर  से  ख़ुशबू  की रंगीन साँसें ,
                                 हम  ना मधुबन हैं जो पी सकेंगे! 
                                 प्राण   मेरा    ना   संजीवनी   है,
                                 हम ना लक्षमन हैं जो जी सकेंगे!

           दर्द   में  दो  नयन  छोड़  आये,
           हम  बिरह में सजन छोड़ आये!
           बंद  करके  सलाख़ों  के  भीतर,
           इक  तड़पता सुगन छोड़ आये !

                                      आँधियों  में  चमन छोड़ आये,
                                      आँसुओं  में  सपन  छोड़ आये!
                                      याद आई  ज़माने की फ़ितरत,
                                      आते आते  कफ़न छोड़ आये !

                                                          -ज्ञानचंद मर्मज्ञ 





















सोमवार, 6 जून 2011

हम अभी से धुआं पी रहे हैं

                                                                 "मौत" भाग-२

                         "हम अभी से धुआं पी रहे हैं"


               मौत का जाम खाली हुआ तो,
               ढल गयीं खुद शराबी निगाहें!
               मौत के सामने सर झुका लीं,
               हाय  वो  इन्क़लाबी  निगाहें!

                                        भूल  से  जिंदगी  पी गए जो,
                                        मौत  की  बद्ददुआ पी  रहे हैं!
                                        कल  तो  अंगार पीना पड़ेगा,
                                        हम अभी  से धुआं पी रहे हैं !

               बर्फ  की  मूर्तियाँ ना बिकेंगी,
               माटी  के  नयन  कौन लेगा !
               रंग   चाहे  हज़ारों  खिले  हों ,
               पत्थरों के सपन कौन लेगा !

                                   किस  लहू  से  समंदर  भरा था,
                                   वक्त  पर ज्वार भी आ सका ना!
                                   चल   पड़े  थे  पकड़ने  किनारा,
                                   हाथ  मँझधार  भी आ सका ना!

                                        अगले अंकों में ज़ारी ...........

                                                         -ज्ञानचंद मर्मज्ञ 


   


मंगलवार, 24 मई 2011

मौत



ज़िन्दगी की भूलभुलैया में हम ऐसे खो जाते हैं कि कभी कभी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी सच्चाई "मौत" को ही भुला बैठते हैं ! कभी सोच कर देखिये अगर मौत ज़िन्दगी के साथ नहीं होती तो क्या होता ! क्या ज़िन्दगी के मायने ऐसे ही होते जैसे आज हैं ! गंतव्य विहीन सफ़र का क्या कोई औचित्य होता? तो क्या जीवन की सार्थकता मृत्यु से प्रेरित होती है ?
आज सोचा जो अटल है क्यों न उसके बारे में कुछ लिखा जाय !
आपके सारगर्भित विचार सादर आमंत्रित है !

                                      मौत                                                                                                     

               चंद  यादों  का  कल ज़िन्दगी है, 
               धड़कनों  की नक़ल ज़िन्दगी है!
               ज़िन्दगी   को   कहाँ  ढूढते   हो,
               मौत  की हमशकल ज़िन्दगी है!

                                   हम न ठहरेंगे अब इस ज़मीं पर,
                                   प्राण  आकाश  का  हो  चुका है !
                                   दर्द  तो  यूँ  ही  ज़िन्दा खड़ा  है ,
                                   क़त्ल अहसास  का  हो चुका है! 

               हम  बुझायेंगे साँसे सम्भल के ,
               प्राण  फिर  भी बहेगा उबल के !
               आ  रही  नींद  तो  हल्के  हल्के 
               कौन जाने चिपक  जाएँ पलकें !

                                      एक  मुर्दा  कफ़न  से  चुराकर,
                                      आईने    में  उतारा  गया   है !
                                      मृत्यु  का  हाय  श्रृंगार  कैसा ,
                                      झील  में  चाँद  मारा गया  है !

                                           ........ अगले अंकों में जारी  

                                                          -ज्ञानचंद मर्मज्ञ 
    

सोमवार, 2 मई 2011

देश का यूँ पतन नहीं होता

                                                                 
     
                                           देश   का   यूँ   पतन   नहीं   होता 


                         एक    छोटा    सुराख़    है    बाकी ,
                         देख  लेना  कोई  ग़म आ  न जाए !
                         अँगुलियों  के बढ़ गए नाख़ून फिर 
                         ये उदासी इस शहर को खा न जाए!

               लुट  रही  है   सिया  जंगलों  में,
               कर  सका  ना  कोई  राम रक्षा ! 
               अब  ना लपटों में सीता जलेगी,
               अब  ना  देगी  कोई भी परीक्षा !

                         अब कभी हँसने का मन नहीं होता 
                         क्या  करें  कुछ जतन  नहीं  होता !
                         गर   लुटेरों   से   वफ़ा  ना   करते,
                         देश   का   यूँ   पतन   नहीं   होता !

               अपने  पैरों  के छालों से डरकर,
               रास्ते   मखमली   न   बनाना !
               बेबसी  के  शहर  में  कभी  भी ,
               हादसों   की  गली   न  बनाना ! 

                                                -ज्ञानचंद मर्मज्ञ 

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

ज़िन्दगी है मुस्कराने के लिए




       ज़िन्दगी  है  मुस्कराने  के  लिए 
       मुश्किलों  को  आज़माने के लिए 

                      वक़्त की क़ीमत समझ पाया न जो 
                      रह  गया   आँसू   बहाने   के  लिए 

       दो  तरह  की  बात  होती है यहाँ 
       एक  बताने  एक छुपाने के लिए 

                       जो चले  थे इन्कलाबों की डगर  
                       वो  खड़े  हैं  सर झुकाने के लिए 

       इन  अँधेरों  के  शहर  में आदमी
       जल रहा है झिलमिलाने के लिए 

                      ख्वाहिशों के रत्न सारे बिक गए 
                      सब्र की क़ीमत चुकाने  के लिए 

       तौलते  हैं  लोग  रिश्तों  को यहाँ 
       कुछ  घटाने  कुछ बढ़ाने के लिए

                     रेत  की  दीवार  सारी  ढह  गयी
                     हम  चले  थे घर बनाने के लिए  

       राजपथ  पर  इत्र  छिड़के जायेंगे 
       उम्र  ख़ुशबू  की  बढ़ाने  के  लिए

                    ख़ून में लथपथ परिंदा गिर पड़ा 
                    देश  की  हालत  सुनाने के लिए                      

       कुछ तो  ऐसे गीत लिखते जाइए 
       काम  आयें  गुनगुनाने  के  लिए 

                    जान से प्यारी  थीं जिनको बेटियाँ 
                    चल  दिए  बहुएँ  जलाने  के  लिए 

                                                         -ज्ञानचंद मर्मज्ञ 

सोमवार, 28 मार्च 2011

मिट्टी की पलकें

                                                                  मिट्टी की पलकें 

मेरी आँखों  को 
एकटक घूरती अनगिनत आँखें 
हर आँख  में धंसी 
हज़ार हज़ार आँखें 
और उन पर ओढ़ाई गईं 
पुरानी पुरानी   
मिट्टी की बनी पलकें !
ये पलकें, 
लगता है-
खुशियों के बह जाने से बनी हैं ,   
किसी महल के ढह जाने से बनी हैं !
चुपचाप 
मौन-शांत निरीह सी 
सदियों से बेजान टंगी,
खुली की खुली ये पलकें
अपनी बुझी आँखों से 
न जाने कब से घूरे जा रही हैं  
मेरी उन पलकों को 
जो हिल रही हैं  
छूने की कोशिश में
उन सपनों की खुशियों को 
जो 
आँखों की झीलों में खिल रही हैं !
उनमें भी 
मेरी पलकों की तरह हिलने की गहरी प्यास है 
तभी तो 
ये सारी की सारी मिट्टी की पलकें 
इस कदर उदास हैं !
लगता है-
आज आँसुओं को बहना ही पड़ेगा,
मुखौटा हटाकर 
इनसे कहना ही पड़ेगा -
लो नोच लो मेरे चहरे को 
और देख लो मेरी वो आँखें 
जो बह गयी हैं खण्डहर बनकर
आंसुओं में ढल के!
मेरे पास भी हैं 
तुम्हारी ही तरह 
मिट्टी की बनी मेरी असली पलकें !

                          -ज्ञानचंद मर्मज्ञ 

रविवार, 20 मार्च 2011

मंदिर का रंग लगे फ़ीका मस्जिद का रंग उड़ा सा है



                                                   जाने कैसी ये होली है 


   आँसू   में  रंग  घुला  बैठे  जाने  कैसी  ये  होली  है
   उम्मीदों  को  बहला  बैठे जाने  कैसी  ये   होली  है 

        दंगों  की आहट होते  ही  दुल्हन विधवा  हो जाती है
        फिर  भी  हम  माँग सजा बैठे जाने कैसी ये होली है 

  हाथों में एक मशाल लिए आँखों में लाख सवाल लिए
  कितने  खुद  को  पिघला बैठे  जाने  कैसी ये होली है 

         मंदिर का रंग लगे फ़ीका मस्जिद का रंग उड़ा सा है
         खूं  से  इनको  नहला  बैठे  जाने  कैसी  ये  होली  है

  रंगों  के  इस बाज़ार से वो जब भी गुज़रे हैं चुपके से
  अपना  हर  रंग  छुपा  बैठे जाने  कैसी  ये   होली है 

          दुनियाँ के रंग निराले हैं दिखते सफ़ेद जो काले हैं
          किस रंग  से रंग मिला बैठे जाने कैसी ये होली है

  रोटी  के  रंगों  की  कीमत  भूखों ने पूछा जब उनसे
  व्यापारी  थे  झुझला  बैठे  जाने  कैसी  ये  होली  है 

        बेबस ममता के रंगों की पहचान करेगी क्या दुनियाँ
        जब  बेटे  ही  झुठला  बैठे  जाने  कैसी  ये  होली  है 

  इस भीड़ में गाँधी बुद्ध नहीं हमें शांति चाहिए युद्ध नहीं 
  नन्हा  सा  मन  दहला  बैठे  जाने  कैसी  ये  होली  है
 
        बस तीन  रंग  के  दीवाने  'मर्मज्ञ'  शहीदों  की होली
        हम  भूल  गए  बिसरा  बैठे   जाने   कैसी ये होली है
  
                            होली की अनन्त शुभकामनाएं.........                              
                                                        -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

रविवार, 13 मार्च 2011

मुखौटा



                                                                          मुखौटा


उस चिलचिलाती धूप में 
अगर मेरी आँखें पिघलकर बह जातीं
तो 
पूरी भीड़ मझे पहचान लेती 
और
मरे कफ़न की तरह 
मुझे भी नोच डाला जाता !
साँसें
अहसास के बिखरे हुए टुकड़ों में बँट कर किसी लावारिश लाश की तरह  
सड़क के किनारे पड़ी मिलतीं !
ऐसा कुछ भी न हो 
बस इसी लिए मैंने वह मुखौटा लगाया था !
और इस लिए भी कि........
नागफनी पर पसरे प्रतीक्षा कर रहे
विश्वास के लहू में पैर रखकर आसानी से वह बाज़ार पार कर जाऊं 
जहाँ 
सिक्कों पर ईमान की मुस्कराहट बिक जाती है 
जहाँ 
केवल इंसान का व्यापार होता है 
और लाँघ जाऊं 
सड़क पर पड़े उन तमाम लाशों के ढेर को 
जो अपने ही कफ़न के लिए भीख मांग रहे हैं!
कसमों और वादों की अर्थी उसी तरह ज्यों की त्यों पड़ी रह जाय 
जिससे जिंदा होने  का स्वांग करते ये मरे हुए लोग उधर से गुज़रें
तो उन्हें 
अपना भविष्य उज्वल होने की कल्पना 
साकार होने का स्वप्न फिर से  दिखने लगे !
इस प्रकार 
मुखौटा पहनकर 
दिल पर पत्थर का दिल बांधकर 
' व्यवस्था ' के  बाज़ार को पार करने की मेरी कोशिश सफल तो हो गयी 
मगर 
जब दर्पण से सामना हुआ तो स्तब्ध रह गया 
वह मुखौटा 
उस धूप में पिघलकर 
मेरा चहरा बन गया था !
                                                 -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

शनिवार, 5 मार्च 2011

आत्मदाह




                                                               आत्मदाह 



            कोशिशें,
            किसी उपग्रह से असफलता का चक्कर लगाती हुईं 
            मेरे ज़ख्मों की डायरी को दीमक बनकर चाट गयीं !
            भावनाएं,
            अनियंत्रित चुम्बकीय मान्यताओं से चिपक कर ठूँठ हो गयीं 
            और सपने ,
            आँखों की गहराई नापते-नापते सागर की सच्चाई हो गए !
            फिर भी मेरा विश्वास 
            हाथों में बहारों का राजाज्ञा -पत्र लिए यूँ ही 
            राजमहल की सड़कों पर पसरे-पसरे 
            उस सोने की मेहराब को देखता रहा ,
            जिसका
            कम से कम एक अणु
            मेरे संकल्प का पुनर्जनम है ,
            मेरे ख़ून की शहादत  है !
            मगर आज
            मैं तुम्हारा राजाज्ञा-पत्र तुम्हें वापस करता हूँ,
            तुम
            मेरी क्रांति को मुक्त कर दो!
            मुझे मेरा वह अणु लौटा दो,
            जिसकी आँच में 
            अपने लहू को खौलाकर फिर से पी सकूँ ,
            और आत्मदाह की पीड़ा से मुक्त होकर
            कम से कम क्षण भर और जी सकूँ !

                                                           -ज्ञानचंद मर्मज्ञ 

                                                                                                         -     

बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

जल सके ना उजालों की पहचान तक




               जल सके ना  उजालों की पहचान तक 
               जलने  वाले जले  फिर भी तूफ़ान तक 

                           रोने  वालों  तुम्हें  तो  पता  भी  न  था 
                           दर्द   की  उम्र  होती  है  मुस्कान  तक

               मंदिरों   की  नहीं  मस्जिदों  की  नहीं
               प्रेम  की  राह  जाती  है  भगवान तक

                           बिक न पाते कभी हम मगर क्या करें
                           आ  गयी  वो वफ़ा चल के दूकान तक 

               हर  गली  हर  मोहल्ले  के  बाज़ार  में 
               बिकते  देखा  है लोगों  को ईमान तक 


                           चाँद   पर  जाने  वालों  बताना   मुझे 
                           आदमी  जब  पहुँच जाए इंसान  तक  

               आदमी   ने    बनाया   है   कैसा  शहर 
               राह गुलशन की जाती है शमशान तक 

                                                          -ज्ञानचंद मर्मज्ञ