ज्ञानचंद मर्मज्ञ

मेरे बारे में

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Bangalore, Karnataka, India
मैंने अपने को हमेशा देश और समाज के दर्द से जुड़ा पाया. व्यवस्था के इस बाज़ार में मजबूरियों का मोल-भाव करते कई बार उन चेहरों को देखा, जिन्हें पहचान कर मेरा विश्वास तिल-तिल कर मरता रहा. जो मैं ने अपने आसपास देखा वही दूर तक फैला दिखा. शोषण, अत्याचार, अव्यवस्था, सामजिक व नैतिक मूल्यों का पतन, धोखा और हवस.... इन्हीं संवेदनाओं ने मेरे 'कवि' को जन्म दिया और फिर प्रस्फुटित हुईं वो कवितायें,जिन्हें मैं मुक्त कंठ से जी भर गा सकता था....... !
!! श्री गणेशाय नमः !!

" शब्द साधक मंच " पर आपका स्वागत है
मेरी प्रथम काव्य कृति : मिट्टी की पलकें
रौशनी की कलम से अँधेरा न लिख
रात को रात लिख यूँ सवेरा न लिख
पढ़ चुके नफरतों के कई फलसफे
इन किताबों में अब तेरा मेरा न लिख

- ज्ञान चंद मर्मज्ञ

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गुरुवार, 7 जुलाई 2011

आते आते कफ़न छोड़ आये

                                 "मौत" भाग -३
                      'आते आते कफ़न छोड़ आये' 
 

           प्राण   के   ब्याह की रात आई,
           उम्र   के    गाँव   बारात  आई!
           गल  गयी फूल की पंखुरी तक,
           एक   ऐसी   भी  बरसात आई!

                                 फिर  से  ख़ुशबू  की रंगीन साँसें ,
                                 हम  ना मधुबन हैं जो पी सकेंगे! 
                                 प्राण   मेरा    ना   संजीवनी   है,
                                 हम ना लक्षमन हैं जो जी सकेंगे!

           दर्द   में  दो  नयन  छोड़  आये,
           हम  बिरह में सजन छोड़ आये!
           बंद  करके  सलाख़ों  के  भीतर,
           इक  तड़पता सुगन छोड़ आये !

                                      आँधियों  में  चमन छोड़ आये,
                                      आँसुओं  में  सपन  छोड़ आये!
                                      याद आई  ज़माने की फ़ितरत,
                                      आते आते  कफ़न छोड़ आये !

                                                          -ज्ञानचंद मर्मज्ञ 





















47 टिप्‍पणियां:

vandan gupta ने कहा…

प्राण के ब्याह की रात आई,
उम्र के गाँव बारात आई!
गल गयी फूल की पंखुरी तक,
एक ऐसी भी बरसात आई!

वाह …………गज़ब के अल्फ़ाज़ और भावों को संजोया है।

Dr Varsha Singh ने कहा…

दर्द में दो नयन छोड़ आये,
हम बिरह में सजन छोड़ आये!
बंद करके सलाख़ों के भीतर,
इक तड़पता सुगन छोड़ आये !


वाह...अद्भुत...

वीना श्रीवास्तव ने कहा…

दर्द में दो नयन छोड़ आये,
हम बिरह में सजन छोड़ आये!
बंद करके सलाख़ों के भीतर,
इक तड़पता सुगन छोड़ आये !

बहुत सुंदर लिखा है...

Anita ने कहा…

फिर से ख़ुशबू की रंगीन साँसें ,
हम ना मधुबन हैं जो पी सकेंगे!
प्राण मेरा ना संजीवनी है,
हम ना लक्षमन हैं जो जी सकेंगे!
बहुत सुंदर! शब्दों और भावों का समन्वय बहुत अच्छा बन पड़ा है.

बेनामी ने कहा…

प्राण के ब्याह की रात आई,
उम्र के गाँव बारात आई!
गल गयी फूल की पंखुरी तक,
एक ऐसी भी बरसात आई!

बहुत खूब.......शानदार लगी ये पंक्तियाँ और पोस्ट.......आभार|

केवल राम ने कहा…

दर्द में दो नयन छोड़ आये,
हम बिरह में सजन छोड़ आये!
बंद करके सलाख़ों के भीतर,
इक तड़पता सुगन छोड़ आये !

भावनाओं को बखूबी अभिव्यक्त किया है आपने ..आपका आभार

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अद्भुत शब्द-भाव संयोजन।

पी.एस .भाकुनी ने कहा…

गल गयी फूल की पंखुरी तक,
एक ऐसी भी बरसात आई!......
संक्षेप में यही कहूँगा की निशब्द कर दिया आपने,
आभार व्यक्त करता हूँ उपरोक्त सुंदर रचना हेतु .........

Bharat Bhushan ने कहा…

याद आई ज़माने की फ़ितरत,
आते आते कफ़न छोड़ आये !
एक नई अभिव्यक्ति. बहुत खूब.

डॉ टी एस दराल ने कहा…

चारों मुक्तक अच्छे लगे . लेकिन दूसरे में गड़बड़ क्यों ?

virendra sharma ने कहा…

भावना प्रवाह में सीजा भीगा गीत .सुन्दर मनोहर भाव .

sushmaa kumarri ने कहा…

behtreen rachna...

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

चमत्कृत हैं आपके शब्द, और मुग्ध करती है उनकी लयबद्धता... विह्वल करते हैं उनमें व्यक्त भाव, और चिंतित करती है वह सोच, जो आप छोड़ जाते हैं!! अप्रतिम ज्ञान चंद जी!!

Unknown ने कहा…

Itani behatareen rachna padhvane ke liye jee shukriya

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

आँधियों में चमन छोड़ आये,
आँसुओं में सपन छोड़ आये!
याद आई ज़माने की फ़ितरत,
आते आते कफ़न छोड़ आये !

बहुत खूब...उम्दा रचना

संध्या शर्मा ने कहा…

दर्द में दो नयन छोड़ आये,
हम बिरह में सजन छोड़ आये!
बंद करके सलाख़ों के भीतर,
इक तड़पता सुगन छोड़ आये !

भावनाओं की लाजवाब अभिव्यक्ति.........

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

दर्द में दो नयन छोड़ आये,
हम बिरह में सजन छोड़ आये!
बंद करके सलाख़ों के भीतर,
इक तड़पता सुगन छोड़ आये !

आन्तरिक भावों के सहज प्रवाहमय सुन्दर रचना....

कुमार राधारमण ने कहा…

बहुत भावुक करती पंक्तियां। प्रवाह देखते ही बनता है।

www.navincchaturvedi.blogspot.com ने कहा…

इन पंक्तियों की गेयता अद्भुत है| सरल, सुमधुर और सुगम्य| आप को बहुत बहुत बधाई|

बेहतर है मुक़ाबला करना

Asha Joglekar ने कहा…

मृत्यु को भी खितनी खूबसूरती से शब्दों में बांधा है ।
अति सुंदर ।

याद आई ज़माने की फ़ितरत,

आते आते कफ़न छोड़ आये !

Kunwar Kusumesh ने कहा…

वाह,ग़ज़ब की लयात्मकता.
ग़ज़ब का शब्द सामंजस्य.
सब कुछ अनोखा रहता है आपके कलाम में.मर्मज्ञ जी.
लाजवाब लाजवाब.

मनोज कुमार ने कहा…

अहाह!
तड़पता ... और कफ़न छोड़ आए! बहुत ही संवेदनशील रचना। मन को छू गई।

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

'याद आई ज़माने की फितरत
आते आते कफ़न छोड़ आये ''
..............बहुत सुन्दर पंक्तियाँ मर्मज्ञ जी
रचना का हर बंद गहन अंतर्भाव को सशक्त अभिव्यक्ति दे रहा है

संजय भास्‍कर ने कहा…

आदरणीय मर्मज्ञ जी
नमस्कार !
हम बिरह में सजन छोड़ आये!
बंद करके सलाख़ों के भीतर,
इक तड़पता सुगन छोड़ आये !

आन्तरिक भावों को बखूबी अभिव्यक्त किया है आपने ..

संजय भास्‍कर ने कहा…

सुंदर भाव लिए प्रभावित करती रचना ..

संजय भास्‍कर ने कहा…

अस्वस्थता के कारण करीब 20 दिनों से ब्लॉगजगत से दूर था
आप तक बहुत दिनों के बाद आ सका हूँ,

दिगम्बर नासवा ने कहा…

गज़ब के भाव है इस रचना में ... छंद मय रचना में तो आप कमाल करते हैं ज्ञान जी ...

रंजना ने कहा…

आपकी रचनाओं का शिल्प और भाव अभिभूत कर जाता है....

अद्वितीय लिखते हैं आप...

आपकी लेखनी को नमन....

Vivek Jain ने कहा…

प्राण के ब्याह की रात आई,
उम्र के गाँव बारात आई!
गल गयी फूल की पंखुरी तक,
एक ऐसी भी बरसात आई!

क्या बात है,
साभार,
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

आचार्य परशुराम राय ने कहा…

बहुत ही लाज़बाब कविता। अंतिम पंक्ति का क्या कहना। बहुत सुन्दर, बहुत सुन्दर। साधुवाद।

Satish Saxena ने कहा…

कमाल की सरलता दिखी इस रचना में मर्मज्ञ भाई ! !
हार्दिक शुभकामनायें ..

डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) ने कहा…

बहुत खूब.......शानदार पोस्ट.......आभार|

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

भाई ज्ञानचंद जी नमस्ते बहुत सुंदर कविता आपको बधाई और शुभकामनायें |

सदा ने कहा…

दर्द में दो नयन छोड़ आये,
हम बिरह में सजन छोड़ आये!
बंद करके सलाख़ों के भीतर,
इक तड़पता सुगन छोड़ आये !
वाह ...बहुत ही बढि़या ...।

sm ने कहा…

thoughtful and touching

ZEAL ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ! कवी ने गहराई से दर्द को महसूस और अभिव्यक्त किया है इस रचना में.

Dorothy ने कहा…

प्राण के ब्याह की रात आई,
उम्र के गाँव बारात आई!
गल गयी फूल की पंखुरी तक,
एक ऐसी भी बरसात आई!

बेहद गहरे अर्थों को समेटती खूबसूरत और संवेदनशील रचना. आभार.
सादर,
डोरोथी.

ज्योति सिंह ने कहा…

फिर से ख़ुशबू की रंगीन साँसें ,
हम ना मधुबन हैं जो पी सकेंगे!
प्राण मेरा ना संजीवनी है,
हम ना लक्षमन हैं जो जी सकेंगे!
bahut hi sundar rachna

Urmi ने कहा…

फिर से ख़ुशबू की रंगीन साँसें ,
हम ना मधुबन हैं जो पी सकेंगे!
प्राण मेरा ना संजीवनी है,
हम ना लक्षमन हैं जो जी सकेंगे!
बहुत ही ख़ूबसूरत और भावपूर्ण पंक्तियाँ! लाजवाब प्रस्तुती!

महेन्‍द्र वर्मा ने कहा…

फिर से ख़ुशबू की रंगीन साँसें
हम ना मधुबन हैं जो पी सकेंगे!
प्राण मेरा ना संजीवनी है
हम ना लक्षमन हैं जो जी सकेंगे!

बहुत अच्छी काव्य रचना।
शुभकामनाएं।

Apanatva ने कहा…

sunder kavy rachana .aapka shavd chayan kabile tareef hai....

Dr. Zakir Ali Rajnish ने कहा…

मन को झंकृत कर देने वाले भाव।

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कम्‍प्‍यूटर से तेज़!
इस दर्द की दवा क्‍या है....

POOJA... ने कहा…

adbhut... parantu mujhe aashcharya nahi hua kyonki aapki rachnaen hamesha hi adbhut hoti hai...

Satish Saxena ने कहा…

दिल को छू लिया इन लाइनों ने ....शुभकामनायें मर्मज्ञ जी !

Alok Verma ने कहा…

याद आई ज़माने की फ़ितरत,
आते आते कफ़न छोड़ आये !

A wonderful expression..!!

S.N SHUKLA ने कहा…

bahut khoobsoorat prastuti

अनुपमा पाठक ने कहा…

प्राण मेरा ना संजीवनी है,
हम ना लक्षमन हैं जो जी सकेंगे!
Nice reference!