ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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Bangalore, Karnataka, India
मैंने अपने को हमेशा देश और समाज के दर्द से जुड़ा पाया. व्यवस्था के इस बाज़ार में मजबूरियों का मोल-भाव करते कई बार उन चेहरों को देखा, जिन्हें पहचान कर मेरा विश्वास तिल-तिल कर मरता रहा. जो मैं ने अपने आसपास देखा वही दूर तक फैला दिखा. शोषण, अत्याचार, अव्यवस्था, सामजिक व नैतिक मूल्यों का पतन, धोखा और हवस.... इन्हीं संवेदनाओं ने मेरे 'कवि' को जन्म दिया और फिर प्रस्फुटित हुईं वो कवितायें,जिन्हें मैं मुक्त कंठ से जी भर गा सकता था....... !
!! श्री गणेशाय नमः !!

" शब्द साधक मंच " पर आपका स्वागत है
मेरी प्रथम काव्य कृति : मिट्टी की पलकें
रौशनी की कलम से अँधेरा न लिख
रात को रात लिख यूँ सवेरा न लिख
पढ़ चुके नफरतों के कई फलसफे
इन किताबों में अब तेरा मेरा न लिख

- ज्ञान चंद मर्मज्ञ

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रविवार, 13 मार्च 2011

मुखौटा



                                                                          मुखौटा


उस चिलचिलाती धूप में 
अगर मेरी आँखें पिघलकर बह जातीं
तो 
पूरी भीड़ मझे पहचान लेती 
और
मरे कफ़न की तरह 
मुझे भी नोच डाला जाता !
साँसें
अहसास के बिखरे हुए टुकड़ों में बँट कर किसी लावारिश लाश की तरह  
सड़क के किनारे पड़ी मिलतीं !
ऐसा कुछ भी न हो 
बस इसी लिए मैंने वह मुखौटा लगाया था !
और इस लिए भी कि........
नागफनी पर पसरे प्रतीक्षा कर रहे
विश्वास के लहू में पैर रखकर आसानी से वह बाज़ार पार कर जाऊं 
जहाँ 
सिक्कों पर ईमान की मुस्कराहट बिक जाती है 
जहाँ 
केवल इंसान का व्यापार होता है 
और लाँघ जाऊं 
सड़क पर पड़े उन तमाम लाशों के ढेर को 
जो अपने ही कफ़न के लिए भीख मांग रहे हैं!
कसमों और वादों की अर्थी उसी तरह ज्यों की त्यों पड़ी रह जाय 
जिससे जिंदा होने  का स्वांग करते ये मरे हुए लोग उधर से गुज़रें
तो उन्हें 
अपना भविष्य उज्वल होने की कल्पना 
साकार होने का स्वप्न फिर से  दिखने लगे !
इस प्रकार 
मुखौटा पहनकर 
दिल पर पत्थर का दिल बांधकर 
' व्यवस्था ' के  बाज़ार को पार करने की मेरी कोशिश सफल तो हो गयी 
मगर 
जब दर्पण से सामना हुआ तो स्तब्ध रह गया 
वह मुखौटा 
उस धूप में पिघलकर 
मेरा चहरा बन गया था !
                                                 -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

61 टिप्‍पणियां:

Dr Varsha Singh ने कहा…

' व्यवस्था ' के बाज़ार को पार करने की मेरी कोशिश सफल तो हो गयी
मगर
जब दर्पण से सामना हुआ तो स्तब्ध रह गया
वह मुखौटा
उस धूप में पिघलकर
मेरा चहरा बन गया था !

आपने बहुत सुन्दर शब्दों में अपनी बात कही है। शुभकामनायें।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जीवन का एक नंगा सत्य। मन को बहला कर हम कुछ कर जाते हैं पर अन्ततः आईने के सामने तो हम नंगे हैं।

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

‘मेरी आँखें पिघलकर बह जातीं’
बात पल्ले नहीं पड़ी :(

सुज्ञ ने कहा…

वह मुखौटा
उस धूप में पिघलकर
मेरा चहरा बन गया था !

मार्मिक व्यथा उकेरी है, आपने।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

वर्त्तमान समाज का आईना प्रस्तुत किया है आपने.. मुखौटा उतारकर रख दिया है!!

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

वह मुखौटा
उस धूप में पिघलकर
मेरा चहरा बन गया था !

यही मुखौटा लिए तो सारा जीवन गुज़र जाता है..... बहुत मार्मिक ...पर सच को समेटे रचना

kshama ने कहा…

इस प्रकार
मुखौटा पहनकर
दिल पर पत्थर का दिल बांधकर
' व्यवस्था ' के बाज़ार को पार करने की मेरी कोशिश सफल तो हो गयी
मगर
जब दर्पण से सामना हुआ तो स्तब्ध रह गया
वह मुखौटा
उस धूप में पिघलकर
मेरा चहरा बन गया था !
Ekdam adbhut!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आईना हमें अपना चेहरा दिखाता है और हम खुद से झूठ नहीं कह सकते ...

Sunil Kumar ने कहा…

वह मुखौटा
उस धूप में पिघलकर
मेरा चहरा बन गया था !

जीवन की सच्चाई को वयां करती हुई रचना, बधाई

रश्मि प्रभा... ने कहा…

कसमों और वादों की अर्थी उसी तरह ज्यों की त्यों पड़ी रह जाय
जिससे जिंदा होने का स्वांग करते ये मरे हुए लोग उधर से गुज़रें
atiuttam

vijai Rajbali Mathur ने कहा…

self explained kavita hai.

पी.एस .भाकुनी ने कहा…

जीवन की सच्चाई को वयां करती हुई रचना,
बधाई

बेनामी ने कहा…

वाह.....ज्ञानचंद जी....आज लफ्ज़ कम पद रहे हैं आपकी इस पोस्ट की तारीफ़ के लिए.....मेरा सलाम है आपको......बहुत ज़बरदस्त लिखते हैं आप......ज़मीं से जुड़े लगों की हकीक़त......सुभानाल्लाह......

सड़क पर पड़े उन तमाम लाशों के ढेर को
जो अपने ही कफ़न के लिए भीख मांग रहे हैं!

संध्या शर्मा ने कहा…

वह मुखौटा
उस धूप में पिघलकर
मेरा चहरा बन गया था !

यही मुखौटा पहने तो पूरा जीवन गुज़र लेता है इन्सान, और फिर अपने चेहरे और मुखोटे के बीच का फर्क भी भूल जाता है ..... बहुत मार्मिक रचना..

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा…

darpan jhooth na bole..:)

लोकेन्द्र सिंह ने कहा…

ज़माने की सच्चाई बयां की है साहब.... अपने इस रचना के साथ....

डॉ टी एस दराल ने कहा…

जिंदगी के घिनोने सच को दर्शाती रचना ।
सशक्त रचना ।

Sushil Bakliwal ने कहा…

इन्सानी व्यापार की यथार्थताएँ कितने ही मुखौटे मिलकर भी छुपा नहीं सकते ।

रचना दीक्षित ने कहा…

जब दर्पण से सामना हुआ तो स्तब्ध रह गया वह मुखौटा उस धूप में पिघलकर मेरा चहरा बन गया था.
उफ़ सचाई से ऐसा सामना न कराईये मर्मज्ञ जी कि जान ही निकल जाए. बी आहूत ही सुंदर रचना. बधाईयां.

Kunwar Kusumesh ने कहा…

' व्यवस्था ' के बाज़ार को पार करने की मेरी कोशिश सफल तो हो गयी
मगर
जब दर्पण से सामना हुआ तो स्तब्ध रह गया
वह मुखौटा
उस धूप में पिघलकर
मेरा चहरा बन गया था !

climax बहुत अच्छा है मर्मज्ञ जी ,वाह वाह क्या बात है.

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

जब दर्पण से सामना हुआ तो स्तब्ध रह गया
वह मुखौटा
उस धूप में पिघलकर
मेरा चहरा बन गया था !...


अंतस को झकझोरती हुई रचना...
हार्दिक बधाई।

ZEAL ने कहा…

आपकी ये रचना आज के समाज का दर्पण है ।

Anita ने कहा…

मुखौटा कब हमारा असली चेहरा बन जाता है हमें ही पता नहीं चलता ! और फिर हमें उसकी आदत ही हो जाती है.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

वाह ज्ञान जी ... आपको छन्द मुक्त रचनाओं में भी इतनी ही महारत रखते अहीं जितनी छन्द बद्ध रचनाओं में ... हर शब्द जैसे पिघलता हुवा लावा हो ... बहुत संवेदनशील ...

आचार्य परशुराम राय ने कहा…

बहुत अच्छी व्यंग्यपूर्ण कविता। आभार।

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

और इस लिए भी कि........नागफनी पर पसरे प्रतीक्षा कर रहे विश्वास के लहू में पैर रखकर आसानी से वह बाज़ार पार कर जाऊं जहाँ सिक्कों पर ईमान की मुस्कराहट बिक जाती है जहाँ केवल इंसान का व्यापार होता है

आद ज्ञानचंद जी, कविता का एक एक शब्द दिल पर उतरता है ......
बहुत ही सशक्त रचना .....

मगर जब दर्पण से सामना हुआ तो स्तब्ध रह गया वह मुखौटा उस धूप में पिघलकर मेरा चहरा बन गया था !

वाह .....अद्भुत वर्णन .....

रंजना ने कहा…

दिल पर पत्थर का दिल बांधकर
' व्यवस्था ' के बाज़ार को पार करने की मेरी कोशिश सफल तो हो गयी
मगर
जब दर्पण से सामना हुआ तो स्तब्ध रह गया
वह मुखौटा
उस धूप में पिघलकर
मेरा चहरा बन गया था !

ऐसा खरा सत्य....निःशब्द हो गयी...
अप्रतिम रचना...

शारदा अरोरा ने कहा…

बहुत बढ़िया , आपने Cmpershad ji को उत्तर नहीं दिया ? ‘मेरी आँखें पिघलकर बह जातीं’ इन पंक्तियों से जो मैंने समझा ...वह यह है अगर आँखें पिघल कर बह जातीं यानि अगर पहचान के भाव उभर आते तो ...यानि एक सोची समझी दूरी बना कर हम चलते रहते हैं ...क्या ये अर्थ ठीक है ?

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

आद. शारदा जी,
'आँखें पिघलने' का भावार्थ एक आम आदमी की पहचान की उस स्थिति से है जो व्यवस्था के हाथों मजबूर होकर अपने जीवन का वह मंज़र देखने के लिए बाध्य होता है जहाँ उसकी बेबसी की अकुलाहट उसे तिल तिल कर मरने को विवश कर देती है !पिघल कर बहती हुई ऐसी अनगिनत आँखें आम आदमी के दर्द की अनसुनी कहानी हैं !
आपने जो अर्थ लिया है ,सही है !
वैसे किसी भी कविता का भावार्थ उसकी व्यंजना में छुपा होता है जो पाठकों की संवेदनाशीलता के अनुसार प्रतिविम्बित होता है !
आपका बहुत आभार !

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

"मगर
जब दर्पण से सामना हुआ तो स्तब्ध रह गया
वह मुखौटा
उस धूप में पिघलकर
मेरा चेहरा बन गया था "
********************
आद० मर्मज्ञ जी ,
बहुत ही सुन्दर ढंग से आपने जीवन और समाज की असुन्दरता को अभिव्यक्ति दी है |
विसंगतियों से बचने-बचाने में मनुष्य अंततः स्वयं ही इसका शिकार कब हो जाता है , पता ही
नहीं चलता | जब वह आत्म समीक्षा करता है तब कहीं समझ पाता है कि वह कहाँ खड़ा है |
सुन्दर एवं भावपूर्ण.....प्रभावशाली कविता के लिए बधाई स्वीकारें |

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत ही सशक्त रचना| धन्यवाद|

कुमार राधारमण ने कहा…

मनुष्य भीड़ का हिस्सा बन तो जाता है मगर अंततः वह है अकेला ही!

सदा ने कहा…

वह मुखौटा
उस धूप में पिघलकर
मेरा चहरा बन गया था !

बहुत खूब कहा है आपने ...।

संजय भास्‍कर ने कहा…

आदरणीय ज्ञानचंद मर्मज्ञ जी
नमस्कार !
आपकी ये रचना आज के समाज का दर्पण है ।

संजय भास्‍कर ने कहा…

कई दिनों व्यस्त होने के कारण  ब्लॉग पर नहीं आ सका
बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..

संजय भास्‍कर ने कहा…

रंगों का त्यौहार बहुत मुबारक हो आपको और आपके परिवार को|

pooja ने कहा…

बहुत बढ़िया लिखा हैं...काबिले तारीफ

Kailash Sharma ने कहा…

मुखौटा पहनकर
दिल पर पत्थर का दिल बांधकर
' व्यवस्था ' के बाज़ार को पार करने की मेरी कोशिश सफल तो हो गयी
मगर
जब दर्पण से सामना हुआ तो स्तब्ध रह गया
वह मुखौटा
उस धूप में पिघलकर
मेरा चहरा बन गया था !

जीवन के कटु सत्य को जिससे हम बच कर निकल जाना चाहते हैं बहुत ही मार्मिकता से उकेरा है आपने इस रचना में..अद्भुत प्रस्तुति..बहुत मर्मस्पर्शी..होली की हार्दिक शुभकामनायें!

उपेन्द्र नाथ ने कहा…

मर्मज्ञ जी, बहुत ही सच्चाई बयां की है आपने ने. आखिर मुखौटा कब तक सच्चाई छुपा सकता है. असली सच्चाई तो उजागर होती ही है. सुंदर प्रस्तुति.

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

भाई मर्मग्य जी होली की रंगभरी शुभकामनाएं |

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

भाई मर्मग्य जी होली की रंगभरी शुभकामनाएं |

विशाल ने कहा…

मर्मज्ञ जी,
बहुत अद्भुत लिखा है आपने.
पूरी रचना ही खूबसूरत है.
तारीफ़ के लिए शब्द कम पड़ रहे हैं.
बहुत खूब.
बहुत ही खूब.
शुभ कामनाएं.

निर्मला कपिला ने कहा…

जीवन का सच दिखाता आईना\ आपको सपरिवार होली की हार्दिक शुभकामनायें।

shikha varshney ने कहा…

जीवन सत्य को परिलक्षित करती रचना.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना!
--
उनको रंग लगाएँ, जो भी खुश होकर लगवाएँ,
बूढ़ों और असहायों को हम, बिल्कुल नहीं सताएँ,
करें मर्यादित हँसी-ठिठोली।
आओ हम खेलें हिल-मिल होली।।
--
होलिकोत्सव की शुभकामनाएँ!

Rahul Singh ने कहा…

मुखौटा धूप में पिघल कर चेहरा बन गया, नया और सुंदर प्रयोग, बधाई.

सूबेदार ने कहा…

इतनी अच्छी बैचारिक कबिता के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद .

manu ने कहा…

रौशनी की कलम से अँधेरा न लिख
रात को रात लिख यूँ सवेरा न लिख
पढ़ चुके नफरतों के कई फलसफे
इन किताबों में अब तेरा मेरा न लिख

bahut khoob likha hai janaab...

manu ने कहा…

रौशनी की कलम से अँधेरा न लिख
रात को रात लिख यूँ सवेरा न लिख
पढ़ चुके नफरतों के कई फलसफे
इन किताबों में अब तेरा मेरा न लिख

bahut khoob likha hai janaab...

amit kumar srivastava ने कहा…

that's why it is said "mirror never lies" nice article...

kshama ने कहा…

Holee kee dhero shubhkamnayen!

Satish Saxena ने कहा…


होली पर कोई पोस्ट नहीं लिखी ...??? आशा है आप स्वस्थ व सानंद होंगे !!
आपको और परिवार को शुभकामनायें मर्मज्ञ जी !

Dr. Zakir Ali Rajnish ने कहा…

होली के पर्व की अशेष मंगल कामनाएं। ईश्वर से यही कामना है कि यह पर्व आपके मन के अवगुणों को जला कर भस्म कर जाए और आपके जीवन में खुशियों के रंग बिखराए।
आइए इस शुभ अवसर पर वृक्षों को असामयिक मौत से बचाएं तथा अनजाने में होने वाले पाप से लोगों को अवगत कराएं।

प्रियंका गुप्ता ने कहा…

बस इतना ही कह सकती हूँ , वाह! क्या खूब लिखा है...|
प्रियंका

Kunwar Kusumesh ने कहा…

हफ़्तों तक खाते रहो, गुझिया ले ले स्वाद.
मगर कभी मत भूलना,नाम भक्त प्रहलाद.

होली की हार्दिक शुभकामनायें.

पी.एस .भाकुनी ने कहा…

होली पर मैं आपको तथा परिवार के लिए मंगल कामनाएं करता हूँ !

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

आपको होली की शुभकामनाएँ
प्रहलाद की भावना अपनाएँ
एक मालिक के गुण गाएँ
उसी को अपना शीश नवाएँ

मौसम बदलने पर होली की ख़शियों की मुबारकबाद
सभी को .

Coral ने कहा…

बहुत मार्मिक पोस्ट

आपको होली कि हार्दिक शुभकामनाये

Dr Xitija Singh ने कहा…

आपको सपरिवार होली की हार्दिक शुभकामनाएं

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

क्या बात है ज्ञान जी! बहुत खूब.
रंग-पर्व पर हार्दिक बधाई.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आपको और समस्त परिवार को होली की हार्दिक बधाई और मंगल कामनाएँ ....