ज्ञानचंद मर्मज्ञ

मेरे बारे में

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Bangalore, Karnataka, India
मैंने अपने को हमेशा देश और समाज के दर्द से जुड़ा पाया. व्यवस्था के इस बाज़ार में मजबूरियों का मोल-भाव करते कई बार उन चेहरों को देखा, जिन्हें पहचान कर मेरा विश्वास तिल-तिल कर मरता रहा. जो मैं ने अपने आसपास देखा वही दूर तक फैला दिखा. शोषण, अत्याचार, अव्यवस्था, सामजिक व नैतिक मूल्यों का पतन, धोखा और हवस.... इन्हीं संवेदनाओं ने मेरे 'कवि' को जन्म दिया और फिर प्रस्फुटित हुईं वो कवितायें,जिन्हें मैं मुक्त कंठ से जी भर गा सकता था....... !
!! श्री गणेशाय नमः !!

" शब्द साधक मंच " पर आपका स्वागत है
मेरी प्रथम काव्य कृति : मिट्टी की पलकें

रौशनी की कलम से अँधेरा न लिख
रात को रात लिख यूँ सवेरा न लिख
पढ़ चुके नफरतों के कई फलसफे
इन किताबों में अब तेरा मेरा न लिख

- ज्ञान चंद मर्मज्ञ

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रविवार, 19 दिसंबर 2010

आतंकवाद :भाग- ४

                             आतंकवाद :भाग- ४


      गिर  पड़े आसमाँ  न ज़मीं पर,
      अब  सुनाता  हूँ मैं  वो कहानी!
      सुन  सकोगे  जो मासूम चीख़ें,
      सूख  जाएगा आँखों  का पानी!

                                      वक़्त भी सोच कर गड़  गया है,
                                      हो   गए    कैसे   इंसां   कसाई!
                                      देख   कर  नन्हें  फूलों से बच्चे,
                                      इनको  थोड़ी  दया भी  न आई!

      छोटी  छोटी  अंगुलियाँ  न  देखो,
      हादसों   की  सिसकियाँ  बड़ी हैं!
      माँ के आँचल में छुपने को आतुर,
      नन्हें   बच्चों  की  लाशें  पड़ी  हैं!

                                  अब   हँसेंगे   खिलौनें  कभी  ना,
                                  अब न  बन्दर चलेगा ठुमक कर! 
                                  माँ  ने  सपनें  सँजो कर बुने  जो,
                                  रोयेगा   सर्दियों   में   वो  स्वेटर!

      मौत  के  बाद  भी कुछ भरम था,
      होंठ  उसका  अभी  भी नरम था!
      था   कलेजे  का   मासूम  टुकड़ा,
      लाश  ठंडी थी  पर खूं  गरम  था!

                                          ........ अगले अंकों में जारी
                                                                        -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

61 टिप्‍पणियां:

kshama ने कहा…

अब हँसेंगे खिलौनें कभी ना,
अब न बन्दर चलेगा ठुमक कर!
माँ ने सपनें सँजो कर बुने जो,
रोयेगा सर्दियों में वो स्वेटर!
Aah! Aakhon me anayas paanee bhar aaya!

vandan gupta ने कहा…

उफ़! रौंगटे खडे हो गये……………बेहद मार्मिक्।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

खौफनाक मंज़र ....बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति

आचार्य परशुराम राय ने कहा…

प्रिय मर्मज्ञ जी,
इंटरनेट की सुविधा से न जुड़े होने के कारण प्रतिदिन आपका मेल नहीं देख पाता हूँ। इसके लिए क्षमा करेंगे। आपकी कविताओं में आपकी प्रतिभा स्पष्ट दिखती है। आपसे क्षमा याचना के साथ केवल इतना ही आग्रह करूँगा कि छन्द में वार्णिक या मात्रिक वृत्त का अवश्य ध्यान रखें जिससे कविता में प्राञ्जलता भंग न हो।

Sunil Kumar ने कहा…

माँ ने सपनें सँजो कर बुने जो,
रोयेगा सर्दियों में वो स्वेटर!
बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति !

डॉ टी एस दराल ने कहा…

मार्मिक।
आखिरी मुक्तक में बेहद खौफनाक नज़ारा है ।

JAGDISH BALI ने कहा…

बहुत ही दिलकश अंदाज़ में आपने समाज़ की काली तस्वीर सामने रखी है !

कुमार राधारमण ने कहा…

जैसे सुभद्रा कुमारी चौहान की कविताओं में एक प्रकार की चित्रात्मक लयबद्धता दिखती है,कुछ वैसा ही महसूस हुआ। अगली कड़ियों का इंतज़ार है।

करण समस्तीपुरी ने कहा…

छोटी छोटी अंगुलियाँ न देखो,
हादसों की सिसकियाँ बड़ी हैं!
माँ के आँचल में छुपने को आतुर,
नन्हें बच्चों की लाशें पड़ी हैं!

.......... उफ़ ... बेहद मार्मिक... !
इस से अधिक कुछ कहा नहीं जा रहा... !

कडुवासच ने कहा…

... prasanshneey rachanaa !!!

महेन्‍द्र वर्मा ने कहा…

छोटी छोटी अंगुलियाँ न देखो,
हादसों की सिसकियाँ बड़ी हैं!
माँ के आँचल में छुपने को आतुर,
नन्हें बच्चों की लाशें पड़ी हैं!

आतंक के बाद के दृश्य को बहुत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है आपने, पढ़कर मन द्रवित हो गया।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

वक़्त भी सोच कर गड़ गया है,
हो गए कैसे इंसां कसाई!
देख कर नन्हें फूलों से बच्चे,
इनको थोड़ी दया भी न आई ...

क्या जबरदस्त चल रही है ये रचना ... आतंकियों का दिल नहीं दहलता ये सब करते हुवे .... रोंगटे खड़े करने वाली रचना है ......

दिगम्बर नासवा ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

क्षमा जी,वंदना जी, संगीता जी,पुरुषोत्तम राय जी,सुनील जी,डा.टी.यस .दराल जी,जगदीश जी,कुमार राधारमण जी,करन जी,उदय जी,महेंद्र वर्मा जी,दिगंबर नासवा जी!
आप सभी का मेरा मनोबल बढ़ाने हेतु आभार प्रकट करता हूँ !
आप सबका स्नेहाकांक्षी,
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

निर्मला कपिला ने कहा…

छोटी छोटी अंगुलियाँ न देखो,
हादसों की सिसकियाँ बड़ी हैं!
माँ के आँचल में छुपने को आतुर,
नन्हें बच्चों की लाशें पड़ी हैं!
आतंकवाद कितना भ्यावह है आपकी रचना ने बखुबी ब्याँ किया है। सच मी ये रचनायें पढ कर आँखें नम हो गयी हमेशा की तरह दिल से लिखा है आपने। शुभकामनायें।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

आतंकवादीय सच का मार्मिक चित्रण।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

पढकर पत्थर का कलेजा भी काँप जाता है.. कैसे निर्मम होंगे वो जिनपर कोई असर नहीं होता!!
ज्ञान चंद जी, अद्भुत शैली है, द्रश्य उओअस्थित ही जाता है और रौंगटे खड़े हो जाते हैं!!

Satish Saxena ने कहा…

बेहतर कलम है आपकी पर इतना भयावह न लिखें तो अच्छा रहेगा भाई जी ! ख़ास तौर पर बच्चों पर......
सादर

बेनामी ने कहा…

आपकी इस सुन्दर और सशक्त रचना की चर्चा
आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
http://charchamanch.uchcharan.com/2010/12/375.html

ZEAL ने कहा…

.

ज्ञान जी,
बेहतरीन तरीके से यथार्थ को चित्रित किया है। सच तो शायद इससे भी कहीं ज्यादा भयावह है। आत्मा को झंझोड़ देने की क्षमता रखने वाली उम्दा रचना के लिए आभार।

सादर,
दिव्या।

.

Shikha Kaushik ने कहा…

bilkul sahi likha hai aapne in aatank failane valon ko bachchon par bhi daya nahi aati .mere blog ''vichronkachabootra''par aane ke liye hardik dhanywad .

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

भयानक मंजर उभारा है ... दिल को झकझोरने वाला मंजर ... आपमें बहुत ज्यादा प्रतिभा है और वो आपकी रचनाओं से साफ़ पता चलता है ...

अनुपमा पाठक ने कहा…

मार्मिक चित्रण...
आँखें नम हैं!

खबरों की दुनियाँ ने कहा…

कैसे और क्या लिखुं आपके लिखे पर , कुछ समझ नहीं आता । मर्म ऐसा की सहा भी नहीं जाता । खून खौल उठता है कि उन दरिन्दों के सर कलम कर दूं , जिन्होनें अपने शैतानी सरों को छिपाने सफ़ेद टोपियाँ पहन रखीं हैं … नमन करता हूँ माँ सरस्वती को , जो यहाँ बसी है आपकी कलम में और उन हजारों हजार माँओं को जो आपके अन्तरमन में बसीं हैं। नमन। "खबरों की दुनियाँ"

Kunwar Kusumesh ने कहा…

छोटी छोटी अंगुलियाँ न देखो,
हादसों की सिसकियाँ बड़ी हैं!
माँ के आँचल में छुपने को आतुर,
नन्हें बच्चों की लाशें पड़ी हैं!

बड़ा सजीव और मार्मिक चित्रण है आतंकवाद का.आपकी लेखनी दमदार है भाई

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

यथार्थ का मार्मिक चित्रण आपने बखूबी किया है। शुभकामनायें।

संध्या शर्मा ने कहा…

लाश ठंडी थी पर खूं गरम था!
Gahrai se dard ki abhivyakti hai is rachna me, aatankwaad ki khofnak dastan...

abhi ने कहा…

कुछ दिन इन्टरनेट से अनुपस्थित रहने की सजा हर जगह से मिल रही है...देखिये आपके भी पिछले तीन पोस्ट्स एक साथ पढ़ गया..

आतंकवाद पे एक सीरीज जारी किया जा सकता है, कभी सोचा नहीं था...
सही में रोंगटे खड़े हो जाते हैं...

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

निर्मला जी,प्रवीण जी,सलिल जी,सतीश जी,डा.रूपचंद जी,दिव्या जी,शिखा जी,इन्द्रनील जी,अनुपमा जी,आशुतोष जी,कुसुमेश जी,शरद जी,संध्या जी और अवि जी,
आप सभी का ब्लॉग पर स्वागत करते हुए हृदय से धन्यवाद प्रेषित करता हूँ !
आप के स्नेह से अभिभूत हूँ !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

PAWAN VIJAY ने कहा…

आँखे नम हो गयी

POOJA... ने कहा…

बहुत अच्छी रचना है... हमेश अहि आपकी रचनाएँ यथार्थ को बहुत अच्छे से प्रस्तुत कर देतीं हैं...
अंत की पंक्तियों न तो दिल निकाल लिया...

shikha varshney ने कहा…

एक सच का मार्मिक चित्रण .

सुज्ञ ने कहा…

अन्दर तक आहत कर जाते भाव!!

अच्छी अभिव्यक्ती.

लोकेन्द्र सिंह ने कहा…

उफ! बहुत ही मार्मिक चित्रण किया है... पलकें गीलीं हो गईं मर्मज्ञ जी।

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

aise prajjwalit mudde par aapki ye samvednaayein aur bhaawnaayein qaabil-e-tareef hain gcm ji....

ममता त्रिपाठी ने कहा…

बहुत ही मर्मस्पर्शी रचना है। एक कटु यथार्थ का सुन्दर एवं सवेदनशील चित्रण

Mukesh ने कहा…

मानवीय संवेदना का एक यथार्थ पक्ष.......जीवन संघर्ष का एक मार्मिक पहलू..............बहुत कुछ है आपकी कविता में।

यही क्रौञ्च वध की व्यथा है जिसे सदा वाल्मीकिरूपी कवि अपनी वाणी देता है और अपने मानसिक सन्ताप एवं करुणा से मुक्ति पाता है।

P.N. Subramanian ने कहा…

बहुत ही मार्मिक!

बेनामी ने कहा…

समयानुकूल और भावपूर्ण कबिता अच्छी अभिब्यक्ति के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद.

सूबेदार ने कहा…

भाव पूर्ण मार्मिक अभिब्यक्ति---.

Deep ने कहा…

hi sir ...

aap ka blog bahut aacha hai kuch sachyi biyan karta hai....


http://punjabismsshayari.blogspot.com
yeh hamara blog hai kabhi time lage to aajaiya kariya ga shayari k liye

निर्झर'नीर ने कहा…

मौत के बाद भी कुछ भरम था,
होंठ उसका अभी भी नरम था!
था कलेजे का मासूम टुकड़ा,
लाश ठंडी थी पर खूं गरम था

upar likhi sari tippaniyon ke bhaavoN ka samavesh hi meri tippani hai ...NI:shaabd karti panktiyan

रंजना ने कहा…

ओह....निःशब्द हूँ.....

कुछ नहीं कहने को मेरे पास...

रंजना ने कहा…

आपकी लेखनी को नमन !!!!

अरुणेश मिश्र ने कहा…

प्रशंसनीय ।

मंजुला ने कहा…

…बेहद मार्मिक्


छोटी छोटी अंगुलियाँ न देखो,
हादसों की सिसकियाँ बड़ी हैं!
माँ के आँचल में छुपने को आतुर,
नन्हें बच्चों की लाशें पड़ी हैं!

रौंगटे खडे हो गये........

Apanatva ने कहा…

rongte khade kardene wala aakho dekha thryushy sa samne aa gaya ....itana jeevant prastutikaran raha......
Bahut khoob.

Bharat Bhushan ने कहा…

'मौत के बाद भी कुछ भरम था,
होंठ उसका अभी भी नरम था!
था कलेजे का मासूम टुकड़ा,
लाश ठंडी थी पर खूं गरम था!'

झकझोरने वाली पंक्तियाँ हैं. मार्मिक रचना.

वीना श्रीवास्तव ने कहा…

माँ ने सपनें सँजो कर बुने जो,
रोयेगा सर्दियों में वो स्वेटर!

बहुत मार्मिक वर्णन, आखिरी बंद तो बस...वेदना दे गया....

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

पवन जी,पूजा जी,शिखा जी,सुज्ञ जी,लोकेन्द्र जी,सुरेन्द्र जी,ममता जी,मुकेश जी,P.N.सुब्रमनियम जी,बेनामी जी,दीर्घतमा जी,निर्झर नीर जी,अरुणेश जी,मंजुला जी,अपनात्वा जी,भूषन जी और वीना जी
आप सभी का आभार प्रकट करते हुए बड़ी प्रसन्नता हो रही है !
आपके विचार ही मेरी उर्जा है !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

बेनामी ने कहा…

वाह ज्ञानचंद जी,

आपकी इन रचनाओ पर आपको मेरा सलाम|

शारदा अरोरा ने कहा…

मर गए सपने , मर गए मन के कुछ हिस्से , अभिव्यक्ति जानदार है ...

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

hriday hil jata hai..
bahut hi marmlk panktiyan..

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत ही मार्मिक चित्रण।

www.navincchaturvedi.blogspot.com ने कहा…

भाई ज्ञान चंद मर्मज्ञ जी, आतंकवाद को लेकर बहुत ही सशक्त प्रस्तुति है ये| वाकई काफ़ी विचारोत्तेजक और सोचने पर विवश करती है ये काव्य कृति| आपकी रचानाधर्मिता को सादर नमन|

अश्विनी कुमार रॉय Ashwani Kumar Roy ने कहा…

"मौत के बाद भी कुछ भरम था,
होंठ उसका अभी भी नरम था!
था कलेजे का मासूम टुकड़ा,
लाश ठंडी थी पर खूं गरम था!"अत्यंत मार्मिक लेखन है आपका, ठीक मर्मज्ञ जी के अनुरूप. बहुत बहुत साधुवाद. अश्विनी रॉय

mukta mandla ने कहा…

बेहतरीन एवं प्रशंसनीय प्रस्तुति ।
हिन्दी को ऐसे ही सृजन की उम्मीद ।

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

इमरान जी,शारदा जी,सुरेन्द्र जी,मनोज जी, नवीन जी,अश्विनी जी और राजीव जी ,
आप सभी का मेरा मनोबल बढाने हेतु धन्यवाद !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

Dorothy ने कहा…

क्रिसमस की शांति उल्लास और मेलप्रेम के
आशीषमय उजास से
आलोकित हो जीवन की हर दिशा
क्रिसमस के आनंद से सुवासित हो
जीवन का हर पथ.

आपको सपरिवार क्रिसमस की ढेरों शुभ कामनाएं

सादर
डोरोथी

उपेन्द्र नाथ ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
उपेन्द्र नाथ ने कहा…

अब हँसेंगे खिलौनें कभी ना,
अब न बन्दर चलेगा ठुमक कर!
माँ ने सपनें सँजो कर बुने जो,
रोयेगा सर्दियों में वो स्वेटर!
बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति...........अगली कड़ियों का इंतज़ार है।
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