ज्ञानचंद मर्मज्ञ

मेरे बारे में

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Bangalore, Karnataka, India
मैंने अपने को हमेशा देश और समाज के दर्द से जुड़ा पाया. व्यवस्था के इस बाज़ार में मजबूरियों का मोल-भाव करते कई बार उन चेहरों को देखा, जिन्हें पहचान कर मेरा विश्वास तिल-तिल कर मरता रहा. जो मैं ने अपने आसपास देखा वही दूर तक फैला दिखा. शोषण, अत्याचार, अव्यवस्था, सामजिक व नैतिक मूल्यों का पतन, धोखा और हवस.... इन्हीं संवेदनाओं ने मेरे 'कवि' को जन्म दिया और फिर प्रस्फुटित हुईं वो कवितायें,जिन्हें मैं मुक्त कंठ से जी भर गा सकता था....... !
!! श्री गणेशाय नमः !!

" शब्द साधक मंच " पर आपका स्वागत है
मेरी प्रथम काव्य कृति : मिट्टी की पलकें

रौशनी की कलम से अँधेरा न लिख
रात को रात लिख यूँ सवेरा न लिख
पढ़ चुके नफरतों के कई फलसफे
इन किताबों में अब तेरा मेरा न लिख

- ज्ञान चंद मर्मज्ञ

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शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

हार्दिक शुभकामनायें

     
           राम   बोले   सुनो   मेरे   भाई
           आना  होगा  कई  बार वन  में,
           कैसे मारेंगे  कलियुग का रावन
           वो  छुपा  होगा  हर एक मन में


      सभी इष्ट मित्रों एवं शुभचिंतकों को 
                 विजय दशमी  की 
                 हार्दिक शुभकामनायें......
                                            - ज्ञानचंद मर्मज्ञ



गुरुवार, 30 सितंबर 2010

हमारा हिंदुस्तान

       दिल में जो  धड़क जाए  उसे जान समझ लेना  
       मिटटी को  मेरे  रूप की  पहचान  समझ  लेना
       दुश्मन  को  भी  गले से  लगा  लें जहाँ के लोग
      उस देश को बस अपना हिन्दुस्तान समझ लेना.
                                                     -ज्ञानचंद मर्मज्ञ



शनिवार, 11 सितंबर 2010



सभी इष्ट-मित्र, शुभचिंतकों को श्री गणेश चतुर्थी की अनंत शुभ-कामनाएं एवं ईद-उल-फितर की दिली मुबारकबाद !