ज्ञानचंद मर्मज्ञ

मेरे बारे में

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Bangalore, Karnataka, India
मैंने अपने को हमेशा देश और समाज के दर्द से जुड़ा पाया. व्यवस्था के इस बाज़ार में मजबूरियों का मोल-भाव करते कई बार उन चेहरों को देखा, जिन्हें पहचान कर मेरा विश्वास तिल-तिल कर मरता रहा. जो मैं ने अपने आसपास देखा वही दूर तक फैला दिखा. शोषण, अत्याचार, अव्यवस्था, सामजिक व नैतिक मूल्यों का पतन, धोखा और हवस.... इन्हीं संवेदनाओं ने मेरे 'कवि' को जन्म दिया और फिर प्रस्फुटित हुईं वो कवितायें,जिन्हें मैं मुक्त कंठ से जी भर गा सकता था....... !
!! श्री गणेशाय नमः !!

" शब्द साधक मंच " पर आपका स्वागत है
मेरी प्रथम काव्य कृति : मिट्टी की पलकें
रौशनी की कलम से अँधेरा न लिख
रात को रात लिख यूँ सवेरा न लिख
पढ़ चुके नफरतों के कई फलसफे
इन किताबों में अब तेरा मेरा न लिख

- ज्ञान चंद मर्मज्ञ

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बुधवार, 3 सितंबर 2014

                               जाने    कैसा   कमाल  करता  है ,
                               एक  पल  में  निहाल  करता   है !
                               रंग    माटी   का  चाहे  जैसा   हो ,
                               फिर भी फूलों को लाल करता है !!
                                                            -ज्ञानचंद मर्मज्ञ 

5 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बढ़िया मुक्तक।

Digamber Naswa ने कहा…

माती की खासियत यही है ...
बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ ...

Anita ने कहा…

बहुत सुंदर...बहुत दिनों बाद आपकी पोस्ट पढ़ी

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

क्या बात वाह!

संजय भास्‍कर ने कहा…

............. अनुपम भाव संयोजन

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