ज्ञानचंद मर्मज्ञ

मेरे बारे में

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Bangalore, Karnataka, India
मैंने अपने को हमेशा देश और समाज के दर्द से जुड़ा पाया. व्यवस्था के इस बाज़ार में मजबूरियों का मोल-भाव करते कई बार उन चेहरों को देखा, जिन्हें पहचान कर मेरा विश्वास तिल-तिल कर मरता रहा. जो मैं ने अपने आसपास देखा वही दूर तक फैला दिखा. शोषण, अत्याचार, अव्यवस्था, सामजिक व नैतिक मूल्यों का पतन, धोखा और हवस.... इन्हीं संवेदनाओं ने मेरे 'कवि' को जन्म दिया और फिर प्रस्फुटित हुईं वो कवितायें,जिन्हें मैं मुक्त कंठ से जी भर गा सकता था....... !
!! श्री गणेशाय नमः !!

" शब्द साधक मंच " पर आपका स्वागत है
मेरी प्रथम काव्य कृति : मिट्टी की पलकें
रौशनी की कलम से अँधेरा न लिख
रात को रात लिख यूँ सवेरा न लिख
पढ़ चुके नफरतों के कई फलसफे
इन किताबों में अब तेरा मेरा न लिख

- ज्ञान चंद मर्मज्ञ

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मंगलवार, 18 अक्तूबर 2011

है काफ़ी महज़ एक इंसान होना

                                                                  
आज कई दिनों के अंतराल के  बाद आप के बीच एक ग़ज़ल लेकर उपस्थित हुआ हूँ आशा है आप पूर्व की भांति अपनी सारगर्भित टिप्पणियों से अनुग्रहित कर  मेरा उत्साहवर्धन करेंगे !

                                                     ग़ज़ल



                               न हीरा, न  मोती, न  चाँदी,  न सोना 
                               है  काफ़ी  महज़   एक  इंसान   होना 

                               ये  जीवन  भी  तो एक रेखा गणित है 
                               कभी  गोल  है  तो  कभी  है  तिकोना 

                               न   महुआ  उगेगा   ना  बरगद  उगेंगे 
                               कभी  गांव  में  तुम शहर को  न बोना 

                               जो  अम्नो अमाँ   की  वफ़ा चाहते हो
                               लहू   के   निशाँ  को  लहू  से  न धोना

                               न छीनो ये चौखट ना छीनो ये आँगन
                               मकानों  को  दे  दो मकानों  का कोना 


                               उसे   सब  पता  है   वही  जानता   है 
                               किसे कब है हँसना किसे कब है रोना 

                                                                  -ज्ञानचंद मर्मज्ञ 

52 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

गहरी अभिव्यक्ति। आपसे साक्षात मिल लेने के बाद आनन्द भी गहरा गया।

करण समस्तीपुरी ने कहा…

मर्मज्ञ जी ग़ज़ल में मिसरा नहीं बल्कि सूक्ति लिखते हैं,

" जो अम्नो अमाँ की वफ़ा चाहते हो लहू के निशाँ को लहू से न धोना"

बापू ने भी तो यही कहा था, "आँख के बदले आँख, मतलब पूरी दुनिया अंधी।"

कुमार राधारमण ने कहा…

सलाह ही नहीं,तथ्य और अनुभव भी।

डॉ टी एस दराल ने कहा…

सुन्दर सार्थक ग़ज़ल ।
वापसी पर स्वागत है ज्ञानचंद जी ।

vijai Rajbali Mathur ने कहा…

गजल उम्दा है। आप की सलाह पर 'जनहित'मे स्तुतियाँ देना प्रारम्भ किया है,कृपया एक बार अवलोकन कर लीजिएगा।
http://janhitme-vijai-mathur.blogspot.com/

S.N SHUKLA ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति, बधाई .

कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारें.

Sunil Kumar ने कहा…

ये जीवन भी तो एक रेखा गणित है
कभी गोल है तो कभी है तिकोना
बहुत सुन्दर प्रस्तुति, बधाई .

kshama ने कहा…

Ekek shabd chunda....ekek pankti bemisaal! Wah!

sushma verma ने कहा…

bhaut hi umda gazal...

Anita ने कहा…

न हीरा, न मोती, न चाँदी, न सोना है काफ़ी महज़ एक इंसान होना

सही है, आज का मानव सब कुछ होना चाहता है पर इंसान नहीं होना चाहता...
उम्दा गजल !

अनाम ने कहा…

सुभानाल्लाह...........हर शेर बेहतरीन .........कोई किसी से कम नहीं.........दाद कबूल करें.........स्वागत है आपका वापसी पर|

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

Raceived by mail:
Kunwar Kusumesh ने आपकी पोस्ट " है काफ़ी महज़ एक इंसान होना " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

बहुत ज़बरदस्त ग़ज़ल.निम्न शेर में जीवन को एकदम नई तरह से परिभाषित किया है आपने.

ये जीवन भी तो एक रेखा गणित है
कभी गोल है तो कभी है तिकोना

वाह.

संतोष पाण्डेय ने कहा…

मर्मज्ञ जी बधाई. हर शेर मुकम्मल और लाजवाब.

SANDEEP PANWAR ने कहा…

बेहतरीन लिखा है,

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

noreply-comment@blogger.com to me
show details 1:20 am (2 days ago)
इस्मत ज़ैदी ने आपकी पोस्ट " है काफ़ी महज़ एक इंसान होना " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

न महुआ उगेगा ना बरगद उगेंगे

कभी गांव में तुम शहर को न बोना


जो अम्नो अमाँ की फ़ज़ा चाहते हो

लहू के निशाँ को लहू से न धोना

बहुत ख़ूबसूरत और बा’मानी अश’आर
बहुत उम्दा !!

Urmi ने कहा…

गहरे भाव और अभिव्यक्ति के साथ शानदार ग़ज़ल लिखा है आपने! बधाई!

ZEAL ने कहा…

Great expression...

Kavita Rawat ने कहा…

न हीरा, न मोती, न चाँदी, न सोना है काफ़ी महज़ एक इंसान होना
..sach insan hona hi sabse aham baat hai..baaki sab to baad ke cheez hain..
sundar bhav..

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

Received by mail:
रचना दीक्षित ने आपकी पोस्ट " है काफ़ी महज़ एक इंसान होना " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

बहुत सुंदर गज़ल. फिर से ब्लॉग पर सक्रिय होने पर आपका स्वागत है.



रचना दीक्षित द्वारा मर्मज्ञ: "शब्द साधक मंच" के लिए ६ दिसम्बर २०११ २:१२ अपराह्न को पोस्ट किया गया

प्रेम सरोवर ने कहा…

आपका पोस्ट मन को प्रभावित करने में सार्थक रहा । बहुत अच्छी प्रस्तुति । मेर नए पोस्ट 'विद्यानिवास मिश्र' पर आकर मेरा मनोबल बढ़ाएं । धन्यवाद ।

सदा ने कहा…

बेहद गहनता लिए प्रत्‍येक शब्‍द ... सार्थक प्रस्‍तुति ।

Amrita Tanmay ने कहा…

बेहद खुबसूरत लिखा है , अच्छी लगी .

डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) ने कहा…

न हीरा, न मोती, न चाँदी, न सोना है काफ़ी महज़ एक इंसान होना.........सुन्दर सार्थक ग़ज़ल ।

Satish Saxena ने कहा…

वाकई उसे सब पता है मर्मज्ञ जी !
शुभकामनायें आपको !

Kailash Sharma ने कहा…

न छीनो ये चौखट ना छीनो ये आँगन
मकानों को दे दो मकानों का कोना

...बहुत खूब! हरेक शेर अपने आप में एक गहन सत्य समाये हुए..आभार

अनुपमा पाठक ने कहा…

ये जीवन भी तो एक रेखा गणित है
कभी गोल है तो कभी है तिकोना
बहुत खूब!

Asha Joglekar ने कहा…

ये जीवन भी तो एक रेखा गणित है
कभी गोल है तो कभी है तिकोना
न महुआ उगेगा ना बरगद उगेंगे कभी गांव में तुम शहर को न बोना

बेहद सुंदर गज़ल ।

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति वाह!

www.navincchaturvedi.blogspot.com ने कहा…

अरसे बाद आप के दर्शन कर के प्रसन्नता हुई ज्ञानचन्द भाई जी। बहुत सही बात कही है - " है क़ाफ़ी महज़ एक इंसान होना।"

ज्योति सिंह ने कहा…

न महुआ उगेगा ना बरगद उगेंगे

कभी गांव में तुम शहर को न बोना


जो अम्नो अमाँ की फ़ज़ा चाहते हो

लहू के निशाँ को लहू से न धोना
laazwaab ,ati uttam ,pate ki baate hai sabhi .

Patali-The-Village ने कहा…

सुन्दर सार्थक ग़ज़ल| बधाई|

प्रेम सरोवर ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति । मेरे मए पोस्ट नकेनवाद पर आप सादर आमंत्रित हैं । धन्यवाद |

Rakesh Kumar ने कहा…

बहुत शानदार प्रस्तुति है आपकी.
आभार.

मेरे ब्लॉग पर आप आये,इसके लिए भी आभार.
आना जाना बनाये रखियेगा जी.

पंछी ने कहा…

bahut hi sarthak abhivyakti..aabhar
mere blog par aapka swagat hai.

Urmi ने कहा…

क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनायें !
मेरे नये पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

Mamta Bajpai ने कहा…

बहुत सुन्दर गजल ...जितनी तारीफ की जाय
कम होगी

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 28-12-2011 को चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

प्रेम सरोवर ने कहा…

प्रस्तुति अच्छी लगी । मेरे नए पोस्ट पर आप आमंत्रित हैं । नव वर्ष -2012 के लिए हार्दिक शुभकामनाएं । धन्यवाद ।

virendra sharma ने कहा…

न छीनो ये चौखट ना छीनो ये आँगन
मकानों को दे दो म
कानों का कोना, सुन्दर रचना .नव वर्ष मुबारक .

Kavita Rawat ने कहा…

नव वर्ष 2012 के लिए हार्दिक शुभकामनाएं ।

Kunwar Kusumesh ने कहा…

आपकी नई पोस्ट का बेसब्री से इंतज़ार है.
नए साल की हार्दिक बधाई,मर्मज्ञ जी.

निवेदिता श्रीवास्तव ने कहा…

उसे सब पता है वही जानता है
किसे कब है हँसना किसे कब है रोना
.........बहुत खूब !

Urmi ने कहा…

आपको एवं आपके परिवार के सभी सदस्य को नये साल की ढेर सारी शुभकामनायें !

प्रेम सरोवर ने कहा…

न छीनो ये चौखट ना छीनो ये आँगन
मकानों को दे दो मकानों का कोना

बहुत खूब.मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है ।

Satish Saxena ने कहा…

प्रभावशाली रचना के लिए बधाई मर्मज्ञ जी !

पंख ने कहा…

umda rachna...... bohot sundar :) :)

pooja ने कहा…

nice post.....

संजय भास्‍कर ने कहा…

बेहद सुंदर गज़ल ।

मेरा मन पंछी सा ने कहा…

बहुत बढ़िया गजल.
लाजवाब...

अनाम ने कहा…

gahri soch liye sundar sarthak prastuti

Unknown ने कहा…

बिलकूल सही कहा आपने
श्रीमान जी आपकी इन रचनाओं में एक एक शब्द सार्थक लगता है
शुक्रिया

Sukhdev 'Karun'

sukhdevkarun.blogspot.com

हमें भी आपके मार्गदर्शन की उम्मीद है
कृपया एक बार आपने अनुभवों से जरुर अवगत कराएँ ।।

आपके मार्गदर्शन का इन्तजार . . .

Asha Joglekar ने कहा…

उसे सब पता है वही जानता है

किसे कब है हँसना किसे कब है रोना

क्या कहें आपकी लेखनी के कायल हैं ।