ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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Bangalore, Karnataka, India
मैंने अपने को हमेशा देश और समाज के दर्द से जुड़ा पाया. व्यवस्था के इस बाज़ार में मजबूरियों का मोल-भाव करते कई बार उन चेहरों को देखा, जिन्हें पहचान कर मेरा विश्वास तिल-तिल कर मरता रहा. जो मैं ने अपने आसपास देखा वही दूर तक फैला दिखा. शोषण, अत्याचार, अव्यवस्था, सामजिक व नैतिक मूल्यों का पतन, धोखा और हवस.... इन्हीं संवेदनाओं ने मेरे 'कवि' को जन्म दिया और फिर प्रस्फुटित हुईं वो कवितायें,जिन्हें मैं मुक्त कंठ से जी भर गा सकता था....... !
!! श्री गणेशाय नमः !!

" शब्द साधक मंच " पर आपका स्वागत है
मेरी प्रथम काव्य कृति : मिट्टी की पलकें
रौशनी की कलम से अँधेरा न लिख
रात को रात लिख यूँ सवेरा न लिख
पढ़ चुके नफरतों के कई फलसफे
इन किताबों में अब तेरा मेरा न लिख

- ज्ञान चंद मर्मज्ञ

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सोमवार, 6 जून 2011

हम अभी से धुआं पी रहे हैं

                                                                 "मौत" भाग-२

                         "हम अभी से धुआं पी रहे हैं"


               मौत का जाम खाली हुआ तो,
               ढल गयीं खुद शराबी निगाहें!
               मौत के सामने सर झुका लीं,
               हाय  वो  इन्क़लाबी  निगाहें!

                                        भूल  से  जिंदगी  पी गए जो,
                                        मौत  की  बद्ददुआ पी  रहे हैं!
                                        कल  तो  अंगार पीना पड़ेगा,
                                        हम अभी  से धुआं पी रहे हैं !

               बर्फ  की  मूर्तियाँ ना बिकेंगी,
               माटी  के  नयन  कौन लेगा !
               रंग   चाहे  हज़ारों  खिले  हों ,
               पत्थरों के सपन कौन लेगा !

                                   किस  लहू  से  समंदर  भरा था,
                                   वक्त  पर ज्वार भी आ सका ना!
                                   चल   पड़े  थे  पकड़ने  किनारा,
                                   हाथ  मँझधार  भी आ सका ना!

                                        अगले अंकों में ज़ारी ...........

                                                         -ज्ञानचंद मर्मज्ञ 


   


38 टिप्‍पणियां:

वन्दना ने कहा…

बर्फ की मूर्तियाँ ना बिकेंगी,
माटी के नयन कौन लेगा !
रंग चाहे हज़ारों खिले हों ,
पत्थरों के सपन कौन लेगा
सत्य को उकेरता मार्मिक चित्रण यथार्थ बोध कराता है।

ZEAL ने कहा…

बर्फ की मूर्तियाँ ना बिकेंगी,
माटी के नयन कौन लेगा !
रंग चाहे हज़ारों खिले हों ,
पत्थरों के सपन कौन लेगा !....

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ज्ञान जी ।

.

Bhushan ने कहा…

बहुत सुंदर भावपूर्ण पंक्तियाँ.

Kailash C Sharma ने कहा…

रंग चाहे हज़ारों खिले हों ,
पत्थरों के सपन कौन लेगा !

.बहुत मार्मिक और सटीक अभिव्यक्ति..हर पंक्ति दिल को छू जाती है..

इमरान अंसारी ने कहा…

शानदार.....आपकी कवितायेँ कुछ अलग रंग लिए होती हैं....लाजवाब लगी पोस्ट|

Vijai Mathur ने कहा…

मौत एक सार्वभौम सत्य है उसकी काव्याभिव्यक्ति द्वारा लोगों को जागरूक करना ठीक है.

Anita ने कहा…

रंग चाहे हजारों खिले हों
पत्थरों के सपन कौन लेगा
बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

भावों की सुन्दर प्रस्तुति।

Vivek Jain ने कहा…

बर्फ की मूर्तियाँ ना बिकेंगी,
माटी के नयन कौन लेगा !
रंग चाहे हज़ारों खिले हों ,
पत्थरों के सपन कौन लेगा !....

बहुत बढ़िया, लाजवाब ज्ञान जी!

विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

बर्फ की मूर्तियाँ ना बिकेंगी,
माटी के नयन कौन लेगा !
रंग चाहे हज़ारों खिले हों ,
पत्थरों के सपन कौन लेगा !

संवेदनशील पंक्तियाँ

Kunwar Kusumesh ने कहा…

भूल से जिंदगी पी गए जो,
मौत की बद्ददुआ पी रहे हैं!
कल तो अंगार पीना पड़ेगा,
हम अभी से धुआं पी रहे हैं !

अहा, क्या कहने है.पढ़ते ही दिलो-दिमाग़ पर छा जाने वाली पंक्तियाँ.
आपकी क़लम और कलाम के तो हम कायल हैं,मर्मज्ञ जी.

sushma 'आहुति' ने कहा…

bhut sunder abhivakti...

Navin C. Chaturvedi ने कहा…

भूल से जिंदगी पी गए जो, मौत की बद्ददुआ पी रहे हैं!
खूबसूरत पंक्तियाँ

रंजना ने कहा…

मृत्यु गीत ऐसे स्वर में बहुत कम गा पाते होंगे...

बहुत बहुत सुन्दर...

Manpreet Kaur ने कहा…

बर्फ की मूर्तियाँ ना बिकेंगी,
माटी के नयन कौन लेगा !
रंग चाहे हज़ारों खिले हों ,
पत्थरों के सपन कौन लेगा !....

बहुत बढ़िया, लाजवाब ज्ञान जी!अपना महत्वपूर्ण टाइम निकाल कर मेरे ब्लॉग पर जरुर आए !
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mahendra verma ने कहा…

बर्फ की मूर्तियाँ ना बिकेंगी,
माटी के नयन कौन लेगा !
रंग चाहे हज़ारों खिले हों ,
पत्थरों के सपन कौन लेगा !

माटी के नयन और पत्थरों के सपन. ये दोनों बिम्ब बिल्कुल नए लगे।
बहुत अच्छी पंक्तियां।

veerubhai ने कहा…

भूल से ज़िन्दगी पी गए जो ,मौत की बद्दुआ पी रहें हैं ,सुन्दर भाव प्रस्तुति मौत का आलिंगन ,चुम्बन ,स्वीकृति कराती रचना .

Jyoti Mishra ने कहा…

beautifully expressed !!
Nice read

Virendra ने कहा…

भूल से जिंदगी पी गए जो,
मौत की बद्ददुआ पी रहे हैं!
कल तो अंगार पीना पड़ेगा,
हम अभी से धुआं पी रहे हैं !


वाह क्या बात है! सुन्दर और सार्थक पंक्तियाँ के लिए आभार.

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना ....

सतीश सक्सेना ने कहा…

मौत के सामने सर झुका लीं,
हाय वो इन्क़लाबी निगाहें!

यह आजकल की निगाहें हैं भाई जी !
:-)

सदा ने कहा…

रंग चाहे हज़ारों खिले हों ,
पत्थरों के सपन कौन लेगा

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना ।

डॉ० डंडा लखनवी ने कहा…

आपकी साहित्य-धर्मिता को प्रणाम!
==========================
प्रवाहित रहे यह सतत भाव-धारा।
जिसे आपने इंटरनेट पर उतारा॥
=====================
’व्यंग्य’ उस पर्दे को हटाता है जिसके पीछे भ्रष्टाचार आराम फरमा रहा होता है।
=====================
सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

निर्मला कपिला ने कहा…

मर्मग्य जी आपकी रचनायें हमेशा ही दिल को छूती हैं मगर इस रचना ने तो कमाल कर दिया हर शब्द हर पँक्ती गहरे भाव लिये हुये है।
भूल से जिंदगी पी गए जो,
मौत की बद्ददुआ पी रहे हैं!
कल तो अंगार पीना पड़ेगा,
हम अभी से धुआं पी रहे हैं !
लाजवाब पँक्तियाँ। बधाई।

संध्या शर्मा ने कहा…

रंग चाहे हज़ारों खिले हों ,
पत्थरों के सपन कौन लेगा !

मार्मिक और सटीक अभिव्यक्ति..भावपूर्ण रचना ....

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

भावपूर्ण,छंदबद्ध,लयबद्ध सुन्दर रचना....

गुनगुनाते हुए बहुत अच्छा लगता है

संतोष पाण्डेय ने कहा…

क्या बात है ज्ञानजी. क्या संवेदना और क्या अभिव्यक्ति का अंदाज़.

mahendra srivastava ने कहा…

पहली बार आपके ब्लाग पर आया हूं.. बहुत सुंदर रचना

आचार्य परशुराम राय ने कहा…

नये बिम्बों और उचित शब्द-योजना ने भाषा में बिलकुल ताजगी भर गयी है। बहुत ही सुन्दर रचना। इसके लिए बधाई और साधुवाद।

Dr Varsha Singh ने कहा…

भावनाओं का बहुत सुंदर चित्रण . ...
यथार्थ का सुन्दर वैचारिक प्रस्तुतिकरण...हार्दिक शुभकामनायें।

मनोज भारती ने कहा…

भूल से जिंदगी पी गए जो,
मौत की बद्ददुआ पी रहे हैं!
कल तो अंगार पीना पड़ेगा,
हम अभी से धुआं पी रहे हैं !

जिंदगी विरोधाभासों से पटी पड़ी है ।

कुमार राधारमण ने कहा…

जीवन और मृत्यु पर विचार करने का अवसर हमें बिरले ही मिलता है। बहुधा,हम न तो जी रहे होते हैं,न मर रहे होते हैं।

Dr Varsha Singh ने कहा…

किस लहू से समंदर भरा था,
वक्त पर ज्वार भी आ सका ना!
चल पड़े थे पकड़ने किनारा,
हाथ मँझधार भी आ सका ना!

कविता की प्रत्येक पंक्ति में अत्यंत सुंदर भाव हैं.... संवेदनाओं से भरी बहुत सुन्दर कविता...

Babli ने कहा…

बहुत सुन्दर और भावपूर्ण कविता है! हर एक पंक्तियाँ लाजवाब है! बेहतरीन प्रस्तुती!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

नूतन .. ने कहा…

ग चाहे हज़ारों खिले हों ,
पत्थरों के सपन कौन लेगा !

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना ।

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

रौशनी की कलम से अँधेरा न लिख
रात को रात लिख यूँ सवेरा न लिख
पढ़ चुके नफरतों के कई फलसफे
इन किताबों में अब तेरा मेरा न लिख
सब से पहले तो अपनी काव्यकृति के लिए बधाई स्वीकार करें
बहुत ख़ूबसूरत क़ता है ,,,इस जज़्बे की बहुत ज़रूरत है हमें

इस सार्थक रचना के अगले अंक का इंतज़ार रहेगा

veerubhai ने कहा…

भावना प्रवाह में सीजा भीगा गीत .सुन्दर मनोहर भाव .

अनुपमा पाठक ने कहा…

मौत को जब ज़िन्दगी गाने लगे तब ऐसे गीत बनते हैं!
सुन्दर!