ज्ञानचंद मर्मज्ञ

मेरे बारे में

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Bangalore, Karnataka, India
मैंने अपने को हमेशा देश और समाज के दर्द से जुड़ा पाया. व्यवस्था के इस बाज़ार में मजबूरियों का मोल-भाव करते कई बार उन चेहरों को देखा, जिन्हें पहचान कर मेरा विश्वास तिल-तिल कर मरता रहा. जो मैं ने अपने आसपास देखा वही दूर तक फैला दिखा. शोषण, अत्याचार, अव्यवस्था, सामजिक व नैतिक मूल्यों का पतन, धोखा और हवस.... इन्हीं संवेदनाओं ने मेरे 'कवि' को जन्म दिया और फिर प्रस्फुटित हुईं वो कवितायें,जिन्हें मैं मुक्त कंठ से जी भर गा सकता था....... !
!! श्री गणेशाय नमः !!

" शब्द साधक मंच " पर आपका स्वागत है
मेरी प्रथम काव्य कृति : मिट्टी की पलकें
रौशनी की कलम से अँधेरा न लिख
रात को रात लिख यूँ सवेरा न लिख
पढ़ चुके नफरतों के कई फलसफे
इन किताबों में अब तेरा मेरा न लिख

- ज्ञान चंद मर्मज्ञ

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मंगलवार, 19 अक्तूबर 2010

ये शहर अब सो रहा है!  


कोई सन्नाटा तो लाओ, ये शहर अब सो रहा है!
हादसों को मत जगाओ, ये शहर अब सो रहा है !

भागने   की  होड़  है  सबको  उलझना  है  यहाँ ,
रस्ते   वीरान   हैं  फिर   भी  पहुंचना   है   वहां ,
पांव  धीरे  से  उठाओ  ये  शहर अब सो रहा है !

कौन  हैं  वो  लोग  जिनके  हाँथ  में  तलवार है,
कंठ  की  ये  प्यास  कैसी  खून  की   दरकार है ,
सब्र को मत आजमाओ, ये शहर अब सो रहा है!

कहकहे  नादान  हैं  खुशियों  से  कतराते  हैं  ये ,
जब  भी होठों  पर बुलाओ   दूर छुप जाते हैं  ये ,
फिर भी थोड़ा मुस्कराओ,ये शहर अब सो रहा है !

खोखली  दीवार  को  चीखों  से  कोई  भर  गया,
आईना  भी  आदमी  पहचानते   ही   डर   गया,
कौन हो कुछ तो बताओ, ये शहर अब सो रहा है!

खौफ  के  बाज़ार  में  बेची  गयी  है   हर   ख़ुशी ,
ढूंढ़  लो  इस  ढेर  में  शायद  पड़ी  हो  ज़िन्दगी ,
क्या पता पहचान जाओ,ये शहर अब सो रहा है!
                                     -ज्ञानचंद मर्मज्ञ 

25 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

खौफ के बाज़ार में
बेची गयी है हर ख़ुशी ,
ढूंढ़ लो इस ढेर में
शायद पड़ी हो ज़िन्दगी ,
क्या पता पहचान जाओ,
ये शहर अब सो रहा है!
--
बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति है!
--
सत्य को आइना दिखाती हुई रचना!
--
बधाई!

shikha varshney ने कहा…

खौफ के बाज़ार में बेची गयी है हर ख़ुशी ,
ढूंढ़ लो इस ढेर में शायद पड़ी हो ज़िन्दगी ,
क्या पता पहचान जाओ,ये शहर अब सो रहा है

बेहद खूबसूरत भाव .बेहतरीन अभिव्यक्ति.

JHAROKHA ने कहा…

कहकहे नादान हैं खुशियों से कतराते हैं ये ,
जब भी होठों पर बुलाओ दूर छुप जाते हैं ये ,
फिर भी थोड़ा मुस्कराओ,ये शहर अब सो रहा है !

खोखली दीवार को चीखों से कोई भर गया,
आईना भी आदमी पहचानते ही डर गया,
कौन हो कुछ तो बताओ, ये शहर अब सो रहा है!
gyanchand ji ,
bahut hi behatreen .pahli baar aapke blog par aai hun ,lekin lagta hai ab aana laga hi rahe rahega.
aapkie sher bhi bahut khoob lage.
mere blog par apna samay dene ke liye hardik dhanyvaad.
poonam

करण समस्तीपुरी ने कहा…

खोखली दीवार को चीखों से कोई भर गया,
आईना भी आदमी पहचानते ही डर गया,
कौन हो कुछ तो बताओ, ये शहर अब सो रहा है!

वाह... ! एक-एक शब्द मे अद्वितीय अभिव्यक्ति. आपने आम जीवन से उपमा और प्रतीक लेकर आधुनिक जीवन शैली के खोखलेपन पर गहरा कुठाराघात किया है. बहुत सुन्दर. धन्यवाद !!!

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

वाह क्या बात है बहुत अच्छा लिखते हैं आप...पहली बार आपके ब्लॉग पर आना सार्थक हुआ.

सुंदर सशक्त अभिव्यक्ति.

बेनामी ने कहा…

शहर अब सो रहा है
बहुत सुन्दर कबिता भाव पूर्ण -------
बधाई---

दीर्घतमा ने कहा…

शहर अब सो रहा है
बहुत सुन्दर कबिता भाव पूर्ण -------
बधाई---

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

पहली बार आया यहाँ... इतनी सरल और सादे शब्दों में इतने गहरे भाव!! एक सचाई और उसके पीछे छिपा दर्द... बेहतरीन!!

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

आप सबकी प्रतिक्रिया मेरे लिए उर्जा है ! किन शब्दों में आभार प्रकट करूँ ,समझ नहीं पा रहा हूँ ! कृपया अपना स्नेह बनायें रखें.
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

arun c roy ने कहा…

बहुत सुंदर कविता.. दुनिया असंवेदनशील हो गई है.. बहुत खूब कहा है आपने

वन्दना ने कहा…

खौफ के बाज़ार में
बेची गयी है हर ख़ुशी ,
ढूंढ़ लो इस ढेर में
शायद पड़ी हो ज़िन्दगी ,
क्या पता पहचान जाओ,
ये शहर अब सो रहा है!

सच को दर्शाती बेहद खूबसूरत रचना।

अजय कुमार ने कहा…

सुंदर अभिव्यक्ति । यथार्थपरक ।

डॉ टी एस दराल ने कहा…

भागने की होड़ है सबको उलझना है यहाँ,
रस्ते वीरान हैं फिर भी पहुंचना है वहां

यथार्थ का सामना कराती रचना । बढ़िया ।

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

आदरणीय अरुण जी,वंदना जी, अजय जी ,डा.दराल जी ,
आप सभी को हृदय से धन्यवाद प्रेषित करता हूँ ! आप सबके उत्साहवर्धन और मार्गदर्शन ने मेरी कलम को नई शक्ति दी है !
सादर,
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

निर्मला कपिला ने कहा…

खौफ के बाज़ार में बेची गयी है हर ख़ुशी ,
ढूंढ़ लो इस ढेर में शायद पड़ी हो ज़िन्दगी ,
क्या पता पहचान जाओ,ये शहर अब सो रहा है!
एक एक पँक्ति काबिले तारीफ है। बधाई आपको।

रंजना ने कहा…

खोखली दीवार को चीखों से कोई भर गया,
आईना भी आदमी पहचानते ही डर गया,
कौन हो कुछ तो बताओ, ये शहर अब सो रहा है!

वाह....मन को छूती बहुत ही भावपूर्ण सुन्दर रचना...
शायद शहर को सोया जान ही लोग इसके सब्र को आजमा रहे हैं...

KAHI UNKAHI ने कहा…

बहुत अच्छा लिख रहे हैं । मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ और बधाई...।

प्रियंका गुप्ता
http://priyankakedastavez.blogspot.com

डॉ. हरदीप संधु ने कहा…

वाह क्या बात है........
खूबसूरत भाव........ .
पहली बार आपके ब्लॉग पर आना सार्थक हुआ!!!

अनुपमा पाठक ने कहा…

bahut sundar aur bhaavpoorna rachna!
regards,

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

बहन निर्मला जी,रंजना जी,प्रियंका जी,हरदीप जी और अनुपमा जी,
अप सबने ब्लॉग पर आकर और अपनी सार्थक टिप्पणी देकर मेरे मनोबल को आकाशीय उंचाई प्रदान किया है!इसके लिए आप सबका आभारी हूँ !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

संजय भास्कर ने कहा…

बेहद खूबसूरत भाव .बेहतरीन अभिव्यक्ति.

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत सुंदर सर! सत्य को आइना दिखाती रचना।

Vivek Rastogi ने कहा…

बहुत ही सुन्दर रचना

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत सुंदर कविता.. दुनिया असंवेदनशील हो गई है.. बहुत खूब कहा है आपने

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

समीक्षा के बाद यह रचना पढ़ी है ...लेकिन पढते हुए मुझे कहीं कोई कमी महसूस नहीं हुई ..उत्तम रचना ..