ज्ञानचंद मर्मज्ञ

मेरे बारे में

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Bangalore, Karnataka, India
मैंने अपने को हमेशा देश और समाज के दर्द से जुड़ा पाया. व्यवस्था के इस बाज़ार में मजबूरियों का मोल-भाव करते कई बार उन चेहरों को देखा, जिन्हें पहचान कर मेरा विश्वास तिल-तिल कर मरता रहा. जो मैं ने अपने आसपास देखा वही दूर तक फैला दिखा. शोषण, अत्याचार, अव्यवस्था, सामजिक व नैतिक मूल्यों का पतन, धोखा और हवस.... इन्हीं संवेदनाओं ने मेरे 'कवि' को जन्म दिया और फिर प्रस्फुटित हुईं वो कवितायें,जिन्हें मैं मुक्त कंठ से जी भर गा सकता था....... !
!! श्री गणेशाय नमः !!

" शब्द साधक मंच " पर आपका स्वागत है
मेरी प्रथम काव्य कृति : मिट्टी की पलकें
रौशनी की कलम से अँधेरा न लिख
रात को रात लिख यूँ सवेरा न लिख
पढ़ चुके नफरतों के कई फलसफे
इन किताबों में अब तेरा मेरा न लिख

- ज्ञान चंद मर्मज्ञ

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गुरुवार, 30 सितंबर 2010

हमारा हिंदुस्तान

       दिल में जो  धड़क जाए  उसे जान समझ लेना  
       मिटटी को  मेरे  रूप की  पहचान  समझ  लेना
       दुश्मन  को  भी  गले से  लगा  लें जहाँ के लोग
      उस देश को बस अपना हिन्दुस्तान समझ लेना.
                                                     -ज्ञानचंद मर्मज्ञ



8 टिप्‍पणियां:

अनुपमा पाठक ने कहा…

waah!!!

पंख ने कहा…

kya baat hai... maza aa gaya... :)

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

कल 25/08/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

ana ने कहा…

ati sundar

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

मिट्टी को मेरे रूप की पहचान समझ लेना....बिल्कुल ही नया प्रयोग.अति-सुंदर.

prerna argal ने कहा…

बहुत सुंदर गहन अभिब्यक्ति /दिल को छु गई /बहुत अच्चा लिखा आपने /इतनी अच्छी रचना के लिए बधाई आपको /


please visit my blog.thanks.
www.prernaargal.blogspot.com

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सटीक मुक्तक

रेखा ने कहा…

बहुत खूब ....